मेरी मां को धूप लगती है (कविता ) ~ मेवालाल
घर से निकलते हुए
चोट में काम करते हुए अब
मेरी माँ को धूप लगती है
आखों से बराबर देख नहीं पाती
कान जलने लगते है
त्वचा फटने लगती है।
अब बोझा सिर को बर्दाश्त नहीं
पैर लड़खड़ाने लगते
हड्डी टूटने लगती
अन्दर ही अन्दर
खुद को संभालने में असमर्थ
फिर भी
परिवार के बारे में सोचती रहती
व्यवस्था कही टूट न जाये
विरासत अपना
जो छूट रहा है मुझसे
आखिर जायेगा कहाँ
कहीं अधिक बोझा न हो
बेटे के सिर पर फिर भी
जिम्मेदारी संभालते हुए
चिंता करती रहती
माथे पर हाथ रखकर
उम्र ने छीन ली
उनकी सहनशीलता
कमजोर पाकर सूरज
कर रहा अत्याचार
मेरे जीवन के सूरज को
जला रहा सूरज
मेरा कितना धूप सा संघर्ष
समय ने कितना बदल दिया
बर्दाश्त नहीं हो रहा परिवर्तन
जानता हूं ताकत अपना
समय अति बलवान
कोई लड़ने को कैसे सोचे।
समय के एकरेखीय चाल से
बगल खड़ा करूं मां
उसे मिलेगी चुनौती मुझसे
अनुशासन शरीर में है
प्राथमिकता मस्तिष्क में
समय बलवान है तो क्या
पूर्वक्रिया दूर दृष्टि अपनी भी
है ताकतवर
कलम की स्याही
स्याही से उत्पादन
मिली चुनौती
समय को मुझसे
मेवालाल
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