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Showing posts from December, 2025

जेएनयू पर (कविता) ~ मेवालाल

 ‎सबकी अपनी निजता है ‎है सबकी अपनी पहचान। ‎सर झुकाने की प्रथा नहीं ‎है असहमति का सम्मान। ‎ ‎आशा करे कर्म के साथ ‎बंधन बिन इच्छा की स्थापना। ‎प्रथम रास्ते में है गति अमंद ‎यहां अनुशासन स्वतंत्रता का संबंध। ‎ ‎जितना चाहे देख सकते ‎उतना तुम सुन सकते। ‎सामाजिक मुद्दों को ‎विविध रंग भरी शैली में। ‎ ‎गुरु शिष्य की परंपरा नहीं ‎अनोखा है मित्रवत व्यवहार। ‎शिक्षक को हाय बाय बोलना ‎यह जेएनयू का समताचार। ‎ ‎कोई मुकाबला क्या करेगा ‎लेकर अपनी झूठी शान। ‎निवेश और उत्पादकता देखो ‎यहां अधिकार कर्तव्य का स्थान। ‎ ‎मानव विभाजन स्वीकार नहीं ‎क्यों न हो विश्वविद्यालय खुशहाल। ‎जहां शिक्षक पिता से रखते ‎विद्यार्थी के अपेक्षाओं का ख्याल। ‎ ‎संवाद विचार विमर्श का जिला ‎देख लो तुम आंखे खोल। ‎मिलेगा नहीं कहीं ऐसा कहीं ‎शांतिमय वातारण का माहौल। ‎ ‎बिना किसी पूर्वाग्रह पक्षपात के ‎समिष्ट में व्यष्टि का महत्त्व। ‎जीवन की कुशल बनाती जहां ‎आलोचनात्मक सोच सृजन के तत्त्व। ‎ ‎प्रकृति संस्कृति का संबंध ‎अंतरानुशासनत्मक ज्ञान प्रक्रिया। ‎सामाजिकता सम्मान अलग ‎परिचय भिन्न प्रदर्शन क्रिया। ‎ ‎खुलकर रहना खुलकर बोलना ‎...

मेरे हाथों की रेखाएं (कविता) ~ मेवालाल

  ‎ रेखाएं जीवन का नक्शा ‎ हर मोड पर एक कहानी ‎ हर टूटन संघर्ष को लेकर ‎ हमे किसी को नहीं सुनानी  ‎ पत्तियां सारी गिरी हुई ‎ दिखती जैसे ठूठ वन। ‎ नहीं मिला हरी घास कहीं ‎ सुख गया है अपना मन। ‎ एक दूसरे को कटती तोड़ती ‎ कहीं बनाती है नक्षत्र  ‎ टूटती जुड़ती नदियों का प्रवाह ‎ गिरती अंगुली बीच मुहाने पर। ‎ लंबे लंबे भ्रांश का विस्तार ‎ कुछ समतल कुछ पर्वत शिखर ‎ जहां नहीं है कोई उपवन ‎ आदिम सभ्यता जंगलीपन ‎ सभ्य संस्कृति पशुवत जीवन ‎ जैसे दोहराया जा रहा इतिहास ‎ पठनीय नहीं लिपि भाषा ‎ रेखाएं बनी कर्म का विश्वास ‎ आंतरिक बल फिर भी जड़ता ‎ पुरानी स्मृतियों की पुरानी गालियां ‎ जहां से हर आदमी है गुजरा। ‎ यहां कुछ छिपा हुआ है ‎ जिसे हमने नहीं समझा ‎ ब्रह्मांड के दूसरे हिस्से तक ‎ रेखाएं मन को दिशा बताती ‎ आत्मा का संतुलित संसार ‎ पड़ता जहां मन का प्रतिबिंब ‎ लोग करते है गलतियां ‎ इंसानों की कमजोरी मानकर ‎ सीखते सुधारते अपने जीवन से ‎ विकसित हुआ नया संसार ‎ किसी के लिए कला ‎ किसी के लिए शांति ‎ किसी के लिए खोज ‎ किसी के लिए प्रेम ‎ आप खुश तो सामने वाला खुश ‎ आप दुखी तो सामने वाला...

सोच (कविता) ~ मेवालाल

 ‎ सोशल मीडिया पर विचरण करते ‎ देखते एक फोटो रहा गंभीर ‎ जिसने पलट दिया  ‎ मेरे विचारों का एक पृष्ठ ‎ दो अलग अलग परिवार ‎ बात करते अलग अलग देखा ‎ एक ही स्थिति पर ‎ यदि हो विचारों पर काम  ‎ तो बदल जाएगी जीवन रेखा। ‎ एक परिवार ‎ अपने एक लड़के के साथ ‎ सुबह सुबह घूमने निकला ‎ हाथों में लेके हाथ ‎ सड़क पर झाड़ू लगाते ‎ जब एक मेहतर देखा। ‎ पिता ने बेटे से बोला ‎ देखो बेटा अगर नहीं पढ़ोगे ‎ झाड़ू लगाओगे ‎ तुम भी मेहतर जैसा। ‎ एक दूसरा परिवार ‎ जब गई नजर मेहतर पर ‎ पिता ने कहा हाथ देकर ‎ देखो बेटा  ‎ पढ़ो तुम मन लगाकर ‎ ताकि झाड़ू लगाने वाले के लिए  ‎ कुछ कर सको बेहतर।      मेवालाल 

प्रेम और भक्ति (निबंध) ~ मेवालाल

  बहुधा हम जीवन में कई वस्तुओं को देखते हैं। उसका स्मृति पटल पर चित्र भी बनाते हैं जिन वस्तुओं या व्यक्तियों को हम गौर से देखते हैं जिनको अपने स्वभाव और संवेदना के अनुकूल पाते हैं। उनको हम पसंद करने लगते है। मानवीय भावों के साथ पसंदीदा वस्तुओं या व्यक्तियों के प्रति हमारा लगाव बढ़ता है। जब यह लगाव हृदय में तीव्र और स्थायी हो जाता है तो लोग उसे प्रेम कहते हैं। यह एक तरफा प्रेम है। जब भावनाएं दूसरे तरफ से भी आकर मिल जाती है तो इन्हीं संयुक्त भावनाओं को प्रेम कहते है। प्रेम मानव से हो सकता है मानवेतर प्राणियों से हो सकता है और अपने आप से भी। व्यक्ति के अंदर पहले से ही श्रद्धा होती है यह श्रद्धा किसी के प्रति हो सकती है। आदर्श व्यक्ति के प्रति और ईश्वर के प्रति भी। यदि ईश्वर के प्रति है तो फिर वह गुरु के शरण में जाता है फिर वह नाम जप करता है। शास्त्रों का अध्ययन करता है। निस्वार्थ भाव से अपने कर्मों को करता है। श्रद्धा का उद्देश्य ईश्वर के प्रति प्रेम व्यक्त करना होता है। व्यक्ति के अंदर ऐसे ही भक्ति का शुरुआत होती है। ‎साधारण जीवन में प्रेम के दो रूपों में अभ्यास किया जाता है - पहला व्...

देह बचाओ (निबंध) ~ मेवालाल

देह को कभी नश्वर वस्तु, कभी आत्मा का निवास, कभी प्रकृति का विकार कभी कभी योग साधना का उपकरण मन गया। कुल मिलकर आध्यात्म ही प्रधान रहा। शरीर को नश्वर मानकर उसे यथार्थ मे पहचानने की कोशिश नही की गयी भारतीय चिंतन परंपरा मे शरीर को उतना महत्व नही दिया गया जितना मन और आत्मा को आत्मा मन परमात्मा आदि का विचार शरीर के अंदर ही निवास करते है। कोई बात नहीं आज देह के बारे में एक गहरे चिंतन की आवश्यकता है तो चिंतन किया जा सकता है और ज्ञान का उत्पादन भी किया जा सकता है और लाभ उठाया जा सकता है। लेकिन महत्त्वपूर्ण शरीर है। आत्मा परमात्मा, पृथ्वी, समाज, परिवार और देश आदि अपना शरीर न रहने पर सब व्यर्थ है। प्राचीन समय की बात है। देवताओं ने मनुष्य की रचना करते समय दो शक्ति दी - देह और दिमाग । देह के हिस्से में बल,श्रम,सहनशीलता कर्म मिला और दिमाग को विचार, निर्णय, कल्पना और दिशा दिया गया। देह मिट्टी का बना है इसलिए वह धरती से जुड़ा हुआ है। दिमाग आकाश से संबंधित है। इसलिए वह ऊँचा सोचता है। एक दिन दोनों में विवाद हो गया कि मेरे सहयोग के बिना तुम कुछ नहीं हो और मैं तुमसे बड़ा हूँ। विवाद बढ़ा तो देवता प्रकट हुए...