देह बचाओ (निबंध) ~ मेवालाल
देह को कभी नश्वर वस्तु, कभी आत्मा का निवास, कभी प्रकृति का विकार कभी कभी योग साधना का उपकरण मन गया। कुल मिलकर आध्यात्म ही प्रधान रहा। शरीर को नश्वर मानकर उसे यथार्थ मे पहचानने की कोशिश नही की गयी भारतीय चिंतन परंपरा मे शरीर को उतना महत्व नही दिया गया जितना मन और आत्मा को आत्मा मन परमात्मा आदि का विचार शरीर के अंदर ही निवास करते है। कोई बात नहीं आज देह के बारे में एक गहरे चिंतन की आवश्यकता है तो चिंतन किया जा सकता है और ज्ञान का उत्पादन भी किया जा सकता है और लाभ उठाया जा सकता है। लेकिन महत्त्वपूर्ण शरीर है। आत्मा परमात्मा, पृथ्वी, समाज, परिवार और देश आदि अपना शरीर न रहने पर सब व्यर्थ है।
प्राचीन समय की बात है। देवताओं ने मनुष्य की रचना करते समय दो शक्ति दी - देह और दिमाग । देह के हिस्से में बल,श्रम,सहनशीलता कर्म मिला और दिमाग को विचार, निर्णय, कल्पना और दिशा दिया गया।
देह मिट्टी का बना है इसलिए वह धरती से जुड़ा हुआ है। दिमाग आकाश से संबंधित है। इसलिए वह ऊँचा सोचता है। एक दिन दोनों में विवाद हो गया कि मेरे सहयोग के बिना तुम कुछ नहीं हो और मैं तुमसे
बड़ा हूँ। विवाद बढ़ा तो देवता प्रकट हुए। देवताओं ने दोनों के संबंधों को बताया और सामंजस्य की बात कही- ब्रह्मा ने कहा - देह तुम बिना दिशा के भार हो
दिमाग तुम बिना कर्म के कल्पना हो। फिर विष्णु ने वरदान दिया कि जब देह कर्म करेगी और दिमाग विवेक देगा तभी मनुष्य पूर्ण होगा। शिव ने कहा
जो देह को कष्ट देकर दिमाग को महान बनाना चाहे वह टूट जायेगा। और जो दिमाग को सुलाकर देह को ही सब कुछ समझे वह भटक जायेगा।
इस प्रकार देवताओ ने दोनों को जोड़ा - देह को दिमाग की सेवा मे और दिमाग को देह की मर्यादा में तभी से मनुष्य चलता है कभी गिरता है तभी सीखता है तभी स्वयं को जानता है। आज मोटापे के युग में जहाँ शरीर का दिन प्रति दिन क्षरण हो रहा हो तो इन्हीं संबंधो को समझते की जरूरत है।
पहले लोग कृषि करके जीवन यापन करते थे। पहले कृषि के समय में श्रम और जीविका दोनों एक दूसरे से जुड़े थे। लोग मेहनत करके फसल उगाते और खाते थे। निरोग रहते थे। लंबा जीते थे। तभी खेती जीविका का सबसे उत्तम साधन था।
उत्तम खेती मध्यम बान।
निषिध चाकरी भीख निदान।
जीविका के लिये सबसे उत्तम काम खेती करना है। उसके बाद वणिक का काम है। नौकरी तो निषिद्ध है और भिक्षावृत्ति तो सबसे बुरा काम है। यह उस समय की कहावत है जब अर्थव्यवस्था कृषि आधारित थी खेती को आत्मनिर्भर और सम्मानित पेशा माना जाता था लेकिन आज भी यह सार्थक है। खेती में लाभ भले न हो पर पेट की जरूरत और परिवार के पालन के लिए किसी के समाने झुकना नहीं पड़ता है। श्रम से शरीर स्वस्थ रहता है। मन प्रसन्न रहता है स्वच्छ वातावरण में रहना और प्रकृति के सनिध्य में रहना, शुद्ध भोजन करना, शुद्ध पानी पीना और शरीर में हवा तो लगता है। दूसरी तरफ नौकरी करने वालों की तो जिंदगी बर्बाद नजर आ रही है। स्वास्थ्य एक अमूल्य निधि है। यह न तो यह बाजारों में मिलता है और ना ही विरासत में। इसे साधना करके अर्जित करना पड़ता है। शरीर को स्वस्थ, फिट और मजबूत बनाना एक व्यक्ति का आत्मसम्मान है। जब हम स्वयं का सम्मान करेंगे तभी दूसरे लोग हमारा सम्मान करेंगे। व्यक्ति स्वयं अपने उपस्थिति से लोगों को अपने बारे में बिना शब्दों के बताता है।
समय के साथ कार्य प्रणाली में बहुत बदलाव आया है। औद्योगिकीकरण का युग है। बढ़ते मशीनीकरण और शहरीकरण ने लोगों की जीवन शैली और कार्य प्रणाली बदल दी है। अब शारीरिक श्रम वाला काम समाप्त हो चुका है। सिर पर बोझा ढोने वाला, फावड़ा-कुदाल चलाने वाला, कुल्हाड़ी चलने वाला काम रह नहीं गया है। आप मानसिक श्रम, कागज कलम या कंप्यूटर वाला श्रम, पूरा दिन बैठकर काम करने वाली प्रणाली प्रचलित है लोग अपनी जीविका या घर परिवार चलाने के लिए नौकरी करते हैं। नौकरी में भी नौकर वाला स्थिति होता है। बिल्कुल गुलामों जैसा। जिसे आप मना नहीं कर सकते। आप जिंदगी को अपने अनुसार नहीं चला सकते। इसमें पर्याप्त शारीरिक श्रम नहीं होता है बल्कि मानसिक बोझा बढ़ता जरूर है।
छह वर्ष की उम्र से विद्यार्थी पढ़ना शुरू करता है और अट्ठाईस तीस वर्ष तक तैयारी करता जाता है तब कहीं नौकरी मिलती है। इस युवावस्था में लोग भविष्य बनाते है। लेकिन अच्छा शरीर खो देते है। इस दौरान शायद ही वह श्रम करता हो। माता पिता भी स्वयं श्रम करने की नैतिक शिक्षा नहीं देते हैं। सोचते है स्कूल वाले सब सिखा दिया जाय। नौकरी के कार्यस्थल पर आठ और बारह घंटे काम कार्यस्थल पर खत्म नहीं होते हैं। कार्यस्थल का काम घर पर भी करना पड़ता है। यह कार्य का दोगलापन है। छुट्टी के दिन भी व्यक्ति आराम नहीं कर पाता है। कुछ ना कुछ उसका काम आ ही जाता है। सुबह उठो थोड़ा योगा या घूमने टहलने के बाद नाश्ता करो और फिर ऑफिस पहुँचो। ऑफिस में कुर्सी पर बैठकर करने वाला काम। उसके बाद पुनः बाइक या चौपहिया वाहन से कमरे पर आवागमन। ऑफिस का कार्यभार सिर पर सवार रहता है। वह भार दो तीन घंटे मोबाइल चलाकर ही उतारा जाता है। उसके बाद खा पीकर थोड़ा घूमना टहलना मोबाइल देखना फिर सो जाना। नौकरी में मात्र वेतन ही हाथ आता है शरीर तो बर्बाद हो जाता है। ज़िंदगी हाथ से निकल जाती है पूरा दिन काम में बीतता है। एक कमरे में जिंदगी बीतता है। कब सुबह होती है कब शाम होती है। दिन कब गुजर गया पता नहीं चलता है। ज़िंदगी अब मशीन में बदल चुकी होती है। ज़िंदगी क्या है कुछ समझ में नहीं आता।
बड़ी बड़ी कंपनी भारत अपना प्लांट लगा रही। बड़े बड़े कंपनी के सीईओ भारत का दौड़ा कर रहे है। नित नवीन हवाई अड्डे बन रहे है। शहरों और रैलवे का आधुनिकीकारण हो रहा है। रैलवे सिटी सेंटर बनने की राह पर है। चारों तरफ विकास हो रहा है। बाजार लगातार बढ़ रहा है। सकल घरेलू उत्पाद भी। देश कि अर्थ व्यवस्था अत्यधिक गतिशील है। तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने वाली है। लेकिन लोगों का जीवन स्तर नहीं बढ़ रहा है। अवैध अतिक्रमण हटाए जा रहे हैं बड़े हॉर्डिंग के डिजिटल खंभे लग रहे हैं। उत्पादन और उपभोग को बढ़ाने वाले उत्पादों से जनता को परिचित कराया जा रहा है। खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा आदि विज्ञापन से लोग सीख रहे है और अपना जीवन स्तर उठाने की कोशिश कर रहे है। विज्ञापन में पहले समस्या बताते है। फिर आपके अंदर डर पैदा करते है फिर समस्या के समाधान के लिए अपने उत्पाद के बारे में बताते है। अपने उत्पाद को देश धर्म और संस्कृति की भावना से जोड़ते है जैसे देश को चाहिए…देश की दम है….धर्म की विशेषता है… भारत की आन बान शान है ... ईश्वर को चाहिए…त्यौहार में बसता है भारत का दिल। संस्कृति को ब्रांड में बदल कर लोगों का दिल जीतकर अत्यधिक उत्पादन किया जा रहा है और अत्यधिक उपभोग भी हो रहा है। लोगों को गुमराह किया जा रहा है। एक उदाहरण देख लीजिए आज बहुधा युवा हेड फोन लगाते हुए व्यायाम या जिम करते देखे जा सकते है। प्रेरणा के नाम पर अपना उत्पाद भी बेचा जा रहा है और दिमाग की शांति भी भंग जा रही है। आराम देने के नाम पर दिमाग को एक आदती बनाया जा रहा है। आसपास के वातारण से सीखने के समय को ध्वनि से भरा जा रहा है ताकि उसे आराम मिले तो संगीत से ही। ऐसा करके आराम के अन्य स्रोत पारिवारिक माहौल और सामाजिकता को तोड़ा जा सके।
आय बढ़ाने के साथ लोगों का खानपान बढ़ता है और खानपान बढ़ने के साथ वजन बढ़ जाता है। श्रम करने के लिये शहर में पर्याप्त जगह नहीं है। जिम मे तो कुछ ही लोग जाते हैं। कुछ लोग तो जिम करने के बाद शरीर में जो दर्द होता है उससे बचने के लिए नहीं जाते हैं। शहरों में तो खेल के मैदान तो है। थोड़ा एक दो घंटा टहलना घूमना, योगा करना, क्रिकेट खेलना या बैडमिंटन खेलना आदि शरीर को फिट रखने के लिए पर्याप्त नहीं है। जो इससे दोगुना श्रम जब रोजाना करता है वही शरीर को फिट रख पाता है। शेष बात शहर में लोगों के पास समय ही कहाँ है? कि इन सब चीजों पर खर्च करें। लोगों के समय सारणी में व्यायाम नहीं है। भारत मे कई समस्याएं हैं। उनमें से एक मोटापा भी है। समाज में दो तरह के लोग अक्सर देखे जाते हैं एक प्लस साइज वाले दूसरे माइनस साइज वाला। फिट और स्वस्थ लोग तो दुर्लभ है। मोटापा आय की असमानता को तो दिखाता ही है साथ ही यह अच्छे प्रबंधन और आत्म जागरूकता की कमी को भी दिखाता है। मेटाबोलिसम (चयापचय) की बात छोड़ दीजिए। एक व्यक्ति क्षण क्षण खा खा कर भारी हो रहा है। दूसरा गुणवत्तापूर्ण भोजन के अभाव में हल्का हो रहा है। लोगों की समस्याएं यह है कि वे समस्या को पहचान ही नहीं पाते। शुरुआत में ही इसके समाधान में लग जाये तो समाधान कर लेंगे। लेकिन समाधान में कैसे लगेंगे? उन्हें तो श्रम करने की आदत नहीं है थोड़े ही श्रम से शरीर दर्द करने लगता है। कौन जाए दर्द सहने। छोड़ो बिस्तर पर लेटना अधिक सुखकर है। मोबाईल है न सब कुछ भुलवाने के लिए। अभी एक घंटे में बाजार निकलना है।
जेब में मोबाइल है और मोबाइल में बैक है तो कहीं कोई दिक्कत नहीं है। आप चाहे जहाँ रहिए। आपको खाने पीने की और रहने में कोई समस्या नहीं आएगी। थोड़ा सा गर्मी लगने पर नारियल पानी, जब चाहो तो चॉकलेट हर महीने होटल जाना परिवार के साथ स्वादिष्ट व्यंजन करना। जब मन कहें तो बर्गर, पिज़्ज़ा के एफ सी का फास्ट फूड रोल और स्ट्रीट फूड। खूब खाओ ज़िंदगी एक बार मिली है। अब जिंदगी आपके हाथ में है कि जिंदगी को नरक बनाना है या स्वर्ग। आप जितना बाहर से ऊर्जा ले रहे हैं उतना ही ऊर्जा को श्रम करके खर्च कीजिए। नहीं तो शरीर का इंजन खराब हो जाएगा। अधिक ऊर्जा लेकर अधिक ताकतवर नहीं बना जा सकता है। अधिक श्रम करके ही ताकतवर बना जा सकता है विज्ञापन की बात मत सुनिये। निकला हुआ पेट पूँजी का उपनिवेश है अत्यधिक पैसे खर्च करके और अत्यधिक देह को आराम देकर इस उपनिवेश को तैयार किया गया है। शरीर का शोषण होता जाता है। आपको पता भी नहीं चल पाता है कि जिंदगी शरीर के बाहर नहीं है। शरीर के प्रति एक पारिवारिक जिम्मेदारी है कि शरीर के प्रति समुचित जबावदेही रखा जाए। पैसा लूटा जा सकता है जमीन छीनी जा सकती है रिश्ते बदले जा सकते हैं लेकिन यदि स्वस्थ सही है तो मनुष्य पुनः इसे अर्जित कर सकता है। यदि स्वास्थ्य खोता है तो सारी दौलत डॉक्टर फीस बनकर रह जाती है। जीवन की कठिनाइयों से जूझने के लिए स्वास्थ्य ही वह आधारशिला है जिस पर सफलता का महल खड़ा किया जा सकता है।
मुझे तो मोटे लोग पसंद नहीं लोग मोटापे से परेशान है। आराम से चल नहीं पाते। झुककर काम नहीं कर पाते। चलते चलते जल्दी थक जाते हैं। चल नहीं जा रहा है। पैर बराबर नहीं पड़ रहे लेटकर आराम करने में ही सुख मिलता है करवट बदलने में भी तकलीफ होती है। मन एक जगह स्थिर नहीं रहता है। पलके बराबर से झपका नहीं पाते है। पलके खोलने में भी जोर लगाना पड़ता है। एक जगह ध्यान केंद्रित करके अधिक देर तक नहीं देख सकते है। बोलने के लिए होठ बराबर खुल नहीं है। सासों की गति अत्यधिक छोटी है। दिन प्रति दिन उनका शरीर ही उन्हें तकलीफ दे रहा है। लोगों का वजन लगातार बढ़ता जा रहा है तो मन में सवाल उठता है कि मोटापा इन्हें तकलीफ दे रही है तो ये अपना वजन घटाते क्यों नहीं है? क्या इन्हें पता नहीं है की हम मोटे रहे हैं? काम जीवन में बहुत अधिक होगा इसलिए श्रम करने के लिए समय नहीं है। जीवन में तो काम कम नहीं होगा यह बात लोगों को मान लेना चाहिए। इसीलिए अपनी क्षमता बढ़ा लेना चाहिए ताकि काम छोटा लगे। काम प्रबंधन, गृह प्रबंधन, और परिवार प्रबंधन तो महत्वपूर्ण है लेकिन सबसे पहले मन का प्रबंधन जरूरी है। यह सारे प्रबंधनों का पिता है। सारे प्रबंधन को व्यवस्थित करके रखता है। मोटापा सुखी संपन्न लोगों का लक्षण है। सुखी वही है जिसके पास पैसा है कूलर और एसी है। आने जाने के लिए चौपहिया वाहन है और पैसा कमाने के लिए श्रम नहीं करना पड़ता है जिनके पास काम के लिए समय है। लाभ कमाने के लिए समय है। लेकिन अपने शरीर के लिए समय नहीं है। देखते ही लोग पहचान लेते है कि मोटे है तो बड़े आदमी होंगे। यह जीवन का आनंद तो उठाने नहीं देता साथ ही अन्य समस्याओं को आमंत्रित भी करता हैं मोटापे को देखकर शुगर, हृदयाघात, उच्च रक्तचाप, लिवर रोग, बांझपन अवसाद आदि कई बीमारियां हाथ जोड़कर कहने लगती हैं कि हमें भी मौका दीजिए और उदारवादी लोग पुरुस्कार समझ रख भी लेते है। अब मोटापा बिमारी नहीं एक रिहायशी कॉलोनी है जहाँ हर फ्लोर पर अलग अलग बीमारियाँ रहती है। जीवन सबसे बड़ा दुखांत यह है कि शरीर में संयुक्त बीमारियों के चलते उमर काम हो रही है।
अगर आपने फिटनेस नहीं चुना तो आपने एक बिमारी भी खरीद लिया। आप कमजोर हो गए और अब एक चतुर आदमी आपसे पैसा कमाने कि कोशिश करेगा। क्योंकि आपने खुद को पहले ही कमजोर दिखा दिया है। अब हृदयाघात की दुकानदारी देखिए। हृदयाघात बिमारी का बड़ा सा विज्ञापन पर देखिए। यह चौराहे पर लगा होता है। आते जाते लोगों का स्वत: ध्यान खींच लेता है। वह चमकीला रंग का होता है। एक आदमी अच्छा खासा कपड़ा पहने हुए अपने दाहिने हाथ का पंजे अपने बाँये हृदय के ऊपर वक्ष को हाथ से कसकर पकड़े हुए है। और उसके हाथ के पंजे पर चारो तरफ एक आभामंडल की टेढ़ा मेढ़ा डिजाइन होता है। वह चीख रहा है और उसके सारे दांत दिख रहे हैं। उसके बगल में लिखा है दिल की सुनो जिंदगी चुनो। न सहें धड़कन की मार हो सकती है दिल की पुकार। आदमी देखकर ही डर जाएगा और विज्ञापनकर्ता विजयी हो जाएंगे शारीरिक लड़ाई होने से पहले आप मानसिक लड़ाई हार गए। ऐसे ही बाँझपन कि दुकानदारी चलती है। इसका विज्ञापन आकर्षक नहीं होता है। लेकिन समाज कि जरूरत पूरा करता है। बाँझपन का विज्ञापन के स्लोगन देखिये - हर कोख को हक है ममता का, विश्वास करे विज्ञान की क्षमता का। अंत करो बाझपन का दुख, अब संभव है संतान का सुख। युवावस्था में लोग जिंदगी का आनंद भी उठाने में इतना व्यस्त रहे की लोगों ने अपने लिए समय नहीं निकाला। माता पिता कभी फील्ड नहीं गए। घर पर योग व्यायाम न किया। कभी दूसरे जगह जाकर श्रमदान ना किया। वे अपने बच्चे को क्या सिखाएंगे। बच्चे तो स्वयं सीख लेंगे - लेटना, उठना, बैठना, टहलना, सोना, मोबाइल चलाना और टीवी देखना। इसको छोड़ दीजिए बच्चों के लालन पालन का क्या कहना? बिलकुल राजा बाबू जैसे - श्रम करने का काम तो तीसरी श्रेणी के लोग करते हैं। हमारा काम है करवाना। श्रम करने से झिझक महसूस होती है। शर्म आती है कि कैसे लोगों के सामने झाड़ू उठा लूँ। लोग क्या कहेंगे। मज़दूरों के साथ श्रमदान करते हमे देखेंगे तो लोग क्या सोचेंगे। लोग जो भी सोचे जो भी कहें लेकिन यह मान लीजिये आपकी जिंदगी दवाओं पर चलेगी। लोगों कि जिंदगी तो दवाओं पर चल ही रही है इसमें कोई नई बात नहीं। इस पर लोगों की दुकानदारी भी चलती है। यदि आप श्रम से अपना शरीर मजबूत बनाते हैं। तो दिमाग तो मजबूत होता ही है साथ ही वृक्ष भी मजबूत होता है। वक्ष मजबूत होने से सासे लंबी और बिना शोर के चलती है और आपकी दिल इतना मजबूत हो जाता है कि आपको पता ही नहीं चलटा है कि हमारा दिल किस तरफ है। दाहिने बगल है या बाएँ बगल। चाहे सुख का वातावरण हो या दुख का। हृदय कि गति समान।
डॉक्टर नहीं हूँ लेकिन कुछ चीजे अनुभव से कह सकता हूँ। मोटापे की वजह से महिलाओं में हार्मोन से असंतुलन पैदा होता है जिससे मासिक चक्र प्रभावित होता है और अंडोंत्सर्जन को भी प्रभावित करता है। गर्भाशय की परत को प्रभावित करता है। मोटापे की वजह से पुरुषों में भी बांझपन आ जाता है। शुक्राणु की संख्या, गति और गुणवत्ता में गिरावट आती है पुरुषों में टेस्टास्टेरॉन घट जाती है प्रजनन क्षमता घट जाती है। नपुंसकता की संभवना भी बढ़ती है। चिकित्सा की सहयोग से तो इसे दूर किया जा सकता है लेकिन जीवन शैली सुधारकर भी इसे दूर किया जा सकता है। यद्यपि डॉक्टर से पूछे जाते है कि भगवान ने हमें बच्चा क्यों नहीं दिया। डॉक्टर बोलता है कि भगवान ने तो मौका दिया पर अपने पेट और मोबाइल को ज़्यादा प्यार दे दिया। डॉक्टर ने वजन कम करने को कहते है लेकिन मरीज को लगता है कि उन्हें सांस लेने की मनाही की जा रही है।
व्यक्ति का देह धन है और बुद्धिमत्ता भी धन है। यह उपनिवेश देह और मस्तिष्क का संबंध को बिगड़ देता है। दोनों धन खतरे में पड़ जाते है। धीरे-धीरे पेट का उपनिवेश अपना विस्तार मस्तिष्क तक करता है। जो आपका भौतिक धन खाली करने के लिए काफी है। लोग स्वास्थ पर बहुत अधिक पैसा खर्च करते है। यदि श्रम कर लिया जाए तो स्वस्थ तो ठीक रहेगा और धन भी बचेगा। अब बचे धन को समाज कल्याण के लिए खर्च किया जा सकता है। लेकिन मेहनत के काम पर लोग इतना अधिक सोचना पसंद नहीं करते हैं। अपने स्वास्थ्य को लेकर बात करे तो किससे करें क्योंकि सारी जिम्मेदारी तो अपनी है। खुद से मेहनत करना पड़ेगा। निजी जिंदगी से लेकर सामाजिक जिंदगी तक सब बेठिकाने हैं शरीर में कुछ ताकत नहीं है सोचने का काम दिमाग अब नहीं कर रहा है वज़नदार शरीर या चर्बीयुक्त पेट मस्तिष्क को अपने नियंत्रण में रखता है। एक फिट या स्वस्थ्य शरीर को हमेशा मस्तिष्क नियंत्रित करता है। यहाँ तक कि यदि मस्तिष्क चाह लें कि वह रात को नहीं सोयेगा तो शरीर की थकान उसे नहीं सुला पायेगी। आप काम करते हुए नहीं थकेंगे। एक दिन में दो चार काम समाप्त करने की क्षमता होती हैं। काम करते हुए जी नहीं उबता है। हर चीज स्मृति में रहती है। जीवन व्यवस्थित रहता है। भूख प्यास पर भी नियंत्रण रहता है। भूखे पेट भी शरीर सक्रिय रहता है। लेकिन मोटापा में इसका उल्टा होता है भारी शरीर मस्तिष्क को नियंत्रण करने लगता है। पहले जो पूरा दिन काम करते हुए शरीर नहीं थकता था। वही अब एक काम करते ही थक जाता है। दूसरे काम के लिए दूसरे दिन का चयन करना पड़ता है। समझ में नहीं आता है कि हो क्या रहा है। भूख लगने पर तुरंत कुछ खाने को चाहिये। भूख थोड़े समय के लिए बर्दाश्त नहीं होता है भोजन करने के तुरंत बाद लेटने के लिए बाध्य होना पड़ता है और तुरंत नींद आ जाती है नींद आने पर ही भोजन पचता है। आराम तो बिस्तर पर लेटकर ही मिलता है न तो कुर्सी पर बैठकर न तो व्यायाम करके। आराम और नींद पर अपना नियंत्रण नहीं होता है। एक दो रोटी खाने से ही पेट कस जाता है। भोजन की मात्रा कम हो जाती है और शरीर में पोषण तत्वों की भी कमी आ जाती है। अब व्यक्ति अस्पताल का रिश्तेदार बन जाता है। व्यक्ति दौड़ने के लिए निकलता है तो दौड़ नही पाता है पैर खुलकर आगे नही बढ़ पाते है। थोड़ा सा दौड़ने पर हड्डी टूटने लगती है। लेकिन इतना होने पर भी दृढ़ निश्चय वाला व्यक्ति लौटकर बिस्तर पर नही जाता है बल्कि वह अंत तक स्थिर बना रहता। वह सोचता है कि यदि थक कर बैठ गया या लौट गया तो उसकी हार हो जाएगी। वह उस मस्तिष्क की बात नहीं सुनता है जो शरीर के वश में है बल्कि अपनी बात करता है आराम करके पुनः व्यायाम करता है और शरीर पर जीत प्राप्त करता है। पुन: शरीर और मस्तिष्क के संबंधों में मस्तिष्क को ऊपर रखता है।
शरीर और मस्तिष्क का संबंध हमें राजा जनक के पास भी देखने को मिलता हैं। एक योगी ने राजा जनक के विदेह कहे जाने कि परीक्षा लेनी चाही और योगी ने अपने तपोबल से अग्नि प्रकट की। और राजा जनक को उसमे पैर रखने को कहा। राजा जनक ने ऐसा ही किया। योगी ने देखा कि अग्नि उनके पैर को नहीं जला रही है। इसके विपरीत उनका मन शांत है। उनके चेहरे पर विचलन नहीं है यह राजा जनक था योगबल था जिससे वे विदेह कहलाए वे अपने देह को जीत चूके थे। शरीर और मस्तिष्क के संबंधों में विदेह ने मस्तिष्क को ऊपर रखा।
पेट और चेहरे का रिश्ता भी अजीब है। पेट निकलने से चेहरा फूल जाता है। आदमी न तो बराबर हँस सकता है ना बोल सकता है। पलकों पर चर्बी चढ़ जाती है। आँख पूरा खुलता नहीं है। ध्यान से पढ़ने पर आँखें नम हो जाती है आँसू निकलने लगते हैं। जब आदमी डॉक्टरी के पास जाता हैं डॉक्टर उसे पावर वाला चश्मा लगाने को कहता है। यदि व्यक्ति श्रम करके पेट की वसा को घटा दे तो चेहरे का चर्बी भी स्वयं हट जाय। और पलको की चर्बी भी समाप्त हो जाय। लेकिन लोगों को दवा श्रम से ही कहीं अधिक बेहतर है। पैर में कुछ अलग तरह का खिचाव पैदा होता है। पानी पीने पर पैर कस जाते हैं। ऐसा खिचाव पर पैर सेट हो जाते है। कि पैर जमीन पर बराबर नहीं पड़ते हैं। चलते वक्त कदम तेजी से आगे बढ़ते हैं। सीढ़ियों पर से व्यक्ति धीरे धीरे उतरता है। सीढ़ियों पर व्यक्ति घुटनों पर हाथ रखकर चढ़ता है। यदि बैठा हुआ है तो घुटनों पर हाथ रखकर उठता है। पैर अपने ही शरीर को बोझा लेकर चलने को तैयार नहीं होता है। कमर दर्द और रीढ़ दर्द तो स्वाभाविक है। व्यक्ति की सबसे बड़ी बुद्धिहीनता यह है कि वह अपने शरीर के बारे में जानता ही नहीं और सब ढोता जाता। शरीर में स्फूर्ती तो पैरो की मजबूती से आती है। जहाँ तक हो सकी कुर्सी पर बैठने की संस्कृति त्याग देनी चाहिए। दो पैरों पर बैठकर काम करना चाहिए विलासी गद्दे को छोड़ जमीन या फर्श पर चटाई बिछाकर रहना चाहिए। वह साइकिल से भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर आ जा सकता है।
आर्ट ऑफ लिविंग के अनुसार हमारे अस्तित्व के सात स्तर हैं—शरीर, साँस, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और आत्मा। ये सभी स्तर आपस में जुड़े हैं और स्वास्थ्य केवल शरीर तक सीमित नहीं है। स्पष्ट है कि बुद्धि और भावना आदि का भी हमारे शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
एक आदमी को मैंने बहुत फिट पाया। मेरे पूछने पर उसने कहा कि मैं नाश्ते में भोजन करना पसंद करता हूं। आधियों से बचने के लिए सिर पर बोझ ढोता हूं। मुझे आराम सुख नहीं देता है जितना श्रम सुख देता है। निश्चित रूप से श्रम में आनंद है। और मन को मजबूत बनाने के पहले शरीर को मजबूत बनाना पड़ता है। अंत में उसने यह भी कहा कि मैं साइकिल से चलता हूं और चटाई पर सोता हूं।
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