मन की चोट (कहानी) ~ मेवालाल
काजू का नाम काजू इसलिए पड़ा कि जब वह करवट लेकर सोती थी पैर को घुटनों से सिकोड़ते हुए उसमें हाथ की कोहनी मिलाकर और थोड़ा सर को झुका लेती थी। तब बिल्कुल काजू का आकार की हो जाती थी। यह उसका नकली नाम था लेकिन घर वाले दुलार से काजू ही कहते थे। दूसरी उसकी आकर्षक विशेषता यह थी कि वह बिना होठ दबाए मुँह खोलकर बाएं तरफ होठों को खींचकर हँसती थी तो लगता था कि चाँद-तारे टूट रहे हो। ऐसा कोई हो ही नहीं सकता जो उसके हँसी को देखकर प्रसन्न न हो। उसके अंदर निडरता थी। वह आँख से आँख मिलकर बात करती थी वह यह नहीं समझती थी कि अभी मेरे पास शब्दों की कमी है। समय के साथ वह बड़ी हुई। समय से कदम मिलते हुए उसने चलना सिखा कि इसी बीच कुछ याद आया।
चार साल की काजू अपने छोटे भाई पप्पू के साथ घर के बरामदे में ‘बाघ-बाघ’ खेल रही थी। इस खेल में उसका अपना निजी अनुभव था। वह अपने अनुसार ही खेल खेलती थी। इस खेल में उसके पास कोई नियम या कायदा नहीं था। इसमें उसकी अपनी वेशभूषा, धरती मंच और हाथ का डंडा हथियार था। डंडे को जादू की छड़ी के रूप में देखा जाय तो वह एक राजकुमारी लग रही थी। यही पप्पू से संवाद का माध्यम था। दो पैरों से धीरे धीरे चल रहे भाई को डंडा लेकर घेर रही थी। उसे आगे बढ़ाने से रोक रही थी। भाई पीछे लौट कर फिर बगल से आगे बढ़ने की कोशिश करता। फिर वह एक हाथ में डंडा लिए दोनों बांह को फैलाकर उसे रोकती। न केवल रोकती बल्कि मुँह फैलाकर बाघ के समान बीच बीच में गर्जना करती – आ आह्, आ आह् ...। मानो कह रही हो कि प्रदर्शन ही असली कला है। जीवन में जिसने खुद को अच्छा प्रदर्शित किया वह कलाकार है। जीवन सौन्दर्य और संघर्ष की विस्तृत शृंखला है। खेल में दोनों और दर्शक का आनन्द उपभोग सौन्दर्य पक्ष है। पप्पू का आगे बढ़ना और काजू द्वारा रोका जाना संघर्ष पक्ष है। मानव स्थिति मंच पर बेहतर ढंग से प्रस्तुत हो रहा है। मंच पर ऐसा दृश्य दर्शक को जीवन की दिशा देने वाला काजू का कार्य ट्राफिक पुलिस का कार्य लग रहा था कि शहर के चौराहे पर खड़ा होकर ट्राफिक पुलिस जैसे गुस्सा प्रकट करके गर्जना कर रहा हो । जैसे दृश्य स्वयं बोल रहा हो कि इधर रहो। इधर नहीं इधर से चलो। अगर उधर जाओगे तो जाम लग जाएगा और व्यवस्था बिगड़ जाएगी। पप्पू काजू के अभिनय से खूब हँस रहा था और घेरा को दाएं-बांए जाकर तोड़ने की कोशिश भी कर रहा था। नाटक में आनन्द की प्राप्ति दोनों का उद्देश्य था। दोनों को खूब मजा आ रहा था।
पर्दा गिरता है और दृश्य बदलता है। सूत्रधार और निर्देशक लेखक के कलम को समझिये जो कथा को आगे बढ़ा रहा है। काजू बूढ़ी औरत के रूप में अवतरित हुई। डंडा के सहारे झुक कर चलती और चलते हुए दरवाजा लांघ गई और सूखे लकड़ियों पर चढ़ रहे कद्दू के पौधे से एक पत्ता तोड़ लाई। पत्ते को जमीन पर और डंडे को बगल में रखकर अपने छोटे छोटे अंगुलियों वाले हाथ से उसमें धूल और कंकड़ रखने लगी। मानो चरवाहा अपना पशु चराकर आया हो और नाद में भूसा और आटा मिलाकर अपने पशु को खिलाने के लिए भोजन तैयार कर रहा हो। यह सब उसने अपने बाबा का अनुसरण कर सीखा था। पप्पू खेल में भागीदार होने के लिए आगे बढ़ता है कि घुटनों के बल चलते हुए काजू के हाथों से तैयार भोजन को करने के लिए आगे बढ़ता है। काजू उसे डांट कर खेल में शामिल करने से मना कर देती है। अनुभव साझा नहीं हुआ तब पप्पू में अलगाव पैदा हुआ। इतने में पप्पू उसके भोजन को खड़े होकर लात मार देता है। काजू उसे धकेल देती है। पप्पू तुरंत जमीन पर गिर जाता है और रोने लगता है। रोते रोते करवट बदलने लगता है। काजू अपना सामान उठाकर दूसरे तरफ रख देती है। वह पूरी तरह धूल धूसरित हो जाता है कि एक चरवाह अपने पशु के प्रति इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है। इस निष्ठुरता का विरोध तो किया ही जा सकता है । पप्पू ने वही किया। दोनों का खेल देखकर लगता मानो दुनिया की सारी खुशी यहीं पर मिलेगी। रंगमंच ने लोगों के तनावपूर्ण जीवन को विराम प्रदान की। आलंबन काजू और पप्पू है। उद्दीपन दर्शक है और जीवन के रस की निष्पत्ति भी हो रही है और साधारणीकरण भी विद्यमान है।
आसमान में सूर्य अपने अंतिम अवस्था में था। रोशनी धीरे धीरे कम होने लगी थी। शाम का बदलता हुआ दृश्य साफ दिखाई दे रहा था। आसमान में सुनहरी और नारंगी रंग का मिश्रण दिखाई दे रहा था। पक्षी अपने घोंसले की ओर लौट रहे थे तथा गाँव से चरने गए पशु अपने घर की ओर। काजू की माँ भोजन पकाने की तैयारी कर चुकी थी। सब्जी चूल्हे पर चढ़ाकर आटा गूथ रही थी। काजू और पप्पू ने चूल्हे पर पहुँचकर थोड़ा सा गेंहू का आटा पात्र से निकाल कर चल दिए। काजू उस आटा का गोली बना बना कर जमीन पर रखने लगी। पप्पू ने उसका अनुसरण किया। काजू अपने हाथों से आटे को मनचाहा आकार दे रही थी। जैसे वह माँ से अलग एक शेफ बन रही थी और जो लड्डू बनाने का काम कर रही हो। दर्शक मंच पर सारे रसोईकारी को देख रहे है कि काजू में शक्ति और हुनर की कमी न थी। हुनर उसने माँ का अनुसरण कर सीखा था। कल्पना उसकी शक्ति थी। दोनों की हर एक पल एक काल्पनिक कहानी कहती है। लेकिन जुबान नहीं चलती है। कभी ये जंगल के रखवाले है। कभी चोर पुलिस और कभी एक दूसरे के गुरु और शिष्य। इसमें न मोह है न दिखावा, सिर्फ निर्मल आनंद एक अद्वितीय रिश्ता का, कथावस्तु की सार्थकता का।
काजू के आजी बाबा खेत में काम करके आ गए थे। काजू और पप्पू दोनों द्वार से ही आजी बाबा का आवाज सुनकर द्वार की ओर दौड़े। काजू को बाबा ने और पप्पू को आजी ने गोद उठा लिया। पप्पू को गोद में लिए हुए अन्दर आई और सुनाना शुरू किया। भैंस को चारा नहीं डाला गया है। गोबर भी इकट्ठा नहीं किया गया है। ये सब मेरे नाम से पड़ा है।
बाबा ने कहा – ‘पानी वानी पी लो और चलो घास लगाओ।’
आजी – ‘मैं तो घर की नौकर तो हूँ ही। घर का भी करूंगी और बाहर का भी। ये हंसिया देखो बीच रस्ते में ही पड़ा है। इसको मै न हटाऊंगी तो नहीं हटेगा। अगर किसी का पैर पड़ जाए तो क्या होगा?’ आजी सारी बात अपनी बहू को झगड़कर समझा रही थी। लेकिन बहू ने जवाब देना उचित न समझा और शांति धारण की और भोजन बनाने में लगी रही। वे घर में इधर-उधर जाते हुए कमी पर कमी निकाल रही थी। ताकि बहु का ध्यान भी इन सब कामों पर रहे। बस समझाने का तरीका नकारात्मक था।
बाबा काजू को पुचकारते हुए चारपाई पर बैठ गए। काजू ने धक्का देकर उन्हें लिटा दिया और पेट पर बैठ गई। बैठकर वह पेट पर उछलने लगी। बाबा के मुँह से निकला – ‘रहने दो बाहिनी नहीं तो पेट खराब हो जाएगा’ बाबा दर्द से कराहने का अभिनय करने लगे – आह् आह् आह् । वह फिर उछलती बाबा फिर दोहराते। आनंदानुभूति देखकर कर पप्पू भी चारपाई पर चढ़ आया । वह काजू के आगे बाबा के पेट पर दोनों तरफ पैर करके बैठ गया। वह भी काजू के समान उछलने लगा। दोनों बारी बारी से रह रह कर उछलते जाते। बाबा से रहा न गया कह दिया देखो तुम दोनों मुझे जीने नहीं दोगे। अभी अभी पानी पिया हूँ और उस पर इतना गदगद।
इतने में बाबा ने ऊब कर करवट ली और उनके जेब से मोबाइल निकलकर रस्सियों से बुने चारपाई पर गिरा। पप्पू ने उसे उठाने के लिए हाथ आगे ही बढ़ाया था कि काजू ने उसके हाथ को अपने हाथ से रोकर और दूसरे हाथ से फोन उठा लिया। हाथ में लेकर बाजा बाजा कहकर उछलने लगी।
पप्पू रोने लगा। बाबा उसको गोद में लेकर बैठ गए। काजू का अर्ज तेज हुआ ई बाजा ई बाजा। काजू का मतलब था कि गाना लगा दो और मैं मोबाइल हाथ में लेकर सुनू। और उसके साथ साथ नाचूं।
आजी घर का गोबर पानी करके हाथ पैर धुलकर पीढ़ा लेकर जमीन पर बैठ गई थी। कहा – ‘घास बालने का जून अभी हुआ या नहीं। तुम तो आए तुरंत लेट कर आराम कर लिए।’
बाबा – ‘अरे मेरा आराम तो तुम्हे बहुत खलता है। तुम्हें कोई रोक रहा है क्या?’ परिवार में उपदेश के साथ हेरफेर भी महत्त्वपूर्ण है। यह आकर्षण की चाल – उल्टा उल्टा। बस चाल समझना सहृदय। परिवार की प्रगति और खुशी दोनों के लिए आवश्यक है। ‘हट जा रे काजूईया।’ वह आगे खड़ी होकर कहने लगी – ‘ई बाजा ई बाजा।’ वे गाना बजाने को तैयार होते कि एक फोन आ गया। कंपन के साथ बज रही मोबाइल को बाबा ने काजू के हाथ से अपने हाथ में लिया और बोलना शुरू किया। हाँ ठीक है। हाँ वह भी ठीक है।... गेहूं कट रहा है। सरसों कट गया है।... अभी उसकी जरूरत नहीं है।... हा होगी तब बता दुँगा।
बीच में आजी ने आवाज लगाई कि कह दो फोन रखो अभी काम करना पड़ा है।
बाबा – ठीक है भैया रखो अब जा रहा हूं कटिया बालने। ... भैया जीओ....
काजू ने अपनी जरूरत नहीं भूली थी। मानो गाना सुनना और नाचना हवाई अड्डा हो जहां से वह कल्पना की उड़ान भरना चाहती थी। मानो वह आत्मुन्नति के लिए खुद को बस प्रस्तुत करना चाहती थी। यह उसके शारीरिक और मानसिक विकास से भी जुड़ा हुआ हो। वह वाणी को समझने की जिम्मेदारी निभाना चाहती थी। इतना सब होने के कारण वह अपना जिद नहीं छोड़ रही थी। आग्रह पर आग्रह करती जा रही थी। बाबा ने बड़े जोर से कहा ‘भाग जाओ नहीं तो पड़ेगा एक थप्पड़। बिल्कुल सर चढ़ती जा रही है... हटो।’ हाथ से झिटककर एक तरफ कर दिया तब चारपाई से उठे। चारपाई से अंगोछा उठाकर पगड़ी बांधा। और कहा ‘उठो चलो लगाओ’
काजू का रोना शुरू हो गया था। वह रोती बहुत जोर से थे कि सुनने वाले कानों को बुरा लग जाए। लेकिन इस बार कुछ ज्यादा तेज से रोई थी। जैसे उसका कुछ टूट गया हो। जैसे उसको बिना गलती के दंड दिया गया हो। जैसे तेज रोने की आवाज डांटे जाने का विरोध हो कि कोई सुनकर अंदर के दुख को पहचाने। जिसके पास टूटी फूटी भाषा हो उसके पास बुरा लगने पर आंसू बहाने के सिवाय क्या है?
वह दोनों हाथों से अपने दोनों आँखों की मलते हुए छोटे छोटे कदमों से सहानुभूति और हमदर्दी के लिए भोजन बना रही माँ की तरफ बढ़ने लगी। मानो तकलीफ से पैर न उठ रहे हो। आँखों में आँसू होने की वजह से उसे कुछ न दिखाई दे रहा था। माँ ने भोजन छोड़ आई और उसे गोद में उठा लिया। उसने माँ के कंधे पर सिर रख दिया। माँ उसे थपकी देकर उसे न रोने को कहने लगी। कभी पीठ थपथपाने लगती। कभी सिर पर थपकी देती। कभी चारपाई को दोष देती तो कभी दीवार को दोष देती। काजू चुप न हुई तो माँ इधर उधर गस्त करने लगी। काजू की माँ ने बोला – ‘अरे डांटना ही था तो धीरे से डांटते इतना जोर से डांटते की क्या जरूरत थी।’... मेरी प्यारी बिटिया। मेरी प्यारी गुड़िया।
आजी ने तुरंत बात को पकड़ा – ‘डांटे क्यों? ये बताओ। उसका फूल झड़ गया।’ काजू की माँ ने सासू माँ के बातों की उपेक्षा करते हुए एक कमरे में गई और झोले में से दूध का बोतल निकल कर उसे पिलाने लगी। पर्दा गिरने लगा। मंच का दुखांत नाटक समाप्त। दर्शक निराश।
मेवालाल शोधार्थी हिन्दी विभाग का हि वि वि वाराणसी, मोबाइल न. 7753019742
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