मानवता (प्रेम कहानी) ~ मेवालाल


रात को आग और ध्रुव को साक्षी मानकर और सात फेरे लेकर शादी हो चुकी थी। आज बारात विदाई के साथ दुल्हन की भी विदाई होने वाली है। सुबह का सूरज चढ़ आया है। रात के सजावट के समान को लोग उतार रहे है। द्वार पर बिखरे पड़े पत्तल और दोने चम्मच को एक दो लोग साफ कर रहे है। जो द्वार पर आ रहा है मिठाई खाकर पानी पी रहा है। बारातियों के नाश्ते के लिए चाय और कॉफी का डग बड़े चूल्हे पर पक रहा है। मूंगदाल का हलवा तैयार हो चुका है। कचौड़ी और  सब्जी तैयार होना बाकी था। कन्या पक्ष की ओर लगभग आठ दस रिश्तेदार थे। बारात करीब तीन सौ मीटर दूर एक खेत में टिकी थी। बारात के कुछ लोग रात को ही भोजन करके निकल गए थे। बारात में अब दुल्हा के मामा फूफा, चाचा और एक दो बुजुर्ग और चार-छह लड़के बचे थे। बारात के एक दो लोग दीनानाथ के द्वार पर आकर विदाई की इजाजत माँग रहे थे। लेकिन दीनानाथ बिना नाश्ता करके जाने का इजाजत नहीं दे रहे थे। दीनानाथ का चेहरा थकान से बहुत मलिन था। पर्याप्त नींद के अभाव में पलके भारी और आँखे लाल थीं लगातार दौड़ धूप के कारण उनका पैर मंद गति से आगे पड़ रहा था। अस्त व्यस्त कपड़े उनके परिश्रम के गवाही दे रहे थे। जिम्मेदारी का बोझ सिर पर अधिक था। आशा है कि आज वह समय के साथ उतर जाएगा। वर्षों का मेहनत जीवन भर का संचित प्रेम एक पवित्र परिणति तक पहुँच गया था। दूसरी जिम्मेदारी यह थी कि बारातियों की सेवा में कोई कमी न रह जाय। उनके द्वार पर चाहे वह रिश्तेदार हो या टोला-पड़ोसी कोई भी हो तो दीनानाथ अधिकार भाव से कहते कि आ गए हो तो नाश्ता करके तब जाना। चाय हलुआ तैयार है। छोले भटूरे बन रहे है। बस थोड़ा समय और लगेगा। तभी दीनानाथ ने एक आदमी को आज्ञा दी कि जाके बारात में समधी से कह दो कि कलेवा के लिए दूल्हा को आने दे।

नाश्ता शुरू हो गया है। निकलने वाले जल्दी जल्दी नाश्ता करके विदाई लेकर जा रहे थे । कलेवा रश्म के लिए दुल्हा सहबाला के साथ घर में प्रवेश करता है। साथ में बारात के दो चार किशोरावस्था के बच्चे भी है। इसमें बड़े बूढ़े नहीं है। आँगन में मांडू की शोभा की अलग छटा है। हल को गाड़ा गया है। उसके ऊपरी शिरे पर राणा नामक सूखे बड़े घास का गणित का धन आकर बना हुआ है। उस धन के मध्य में इधर उधर दो मिट्टी का दिया चिपका हुआ है। नीचे चूल्हे की मिट्टी पर बड़ा सा मटका रखा हुआ है। उसमें एक मुट्ठी बढ़नी रखी हुई है। धरती पर आसमान के नीचे मानव द्वारा बनाया गया देवस्थल। यहाँ हर एक चीज का अपना महत्त्व है। सामने पराली के चटाई पर गद्दा डाला गया और उस पर सफेद शीट बिछाई गई। दुल्हा और सहबाला ने आकर उस पर विराजमान हुए। दूल्हे में संकोच और आनंद का अद्भुत संयोग था। लेकिन अपने उम्र के लड़कों के साथ महोल अच्छा लग रहा था। गाँव की आठ दस नामी औरतों ने गारी गीत शुरू किया –

आरिया आरिया रैया बोवायो बिचवा बोवायो चौरैया जी वाह वाह

सांगवा खोटन गई दुल्हा की बाहिनी....

दुल्हा और सहबाला के फूल की थाली में मिट्ठा, पूड़ी और दही रखा गया। शेष लड़कों को स्टील की थाली में मिट्ठा, पूड़ी और दही परोसा गया। कुछ क्षण बाद बुआ ने आकर दूल्हे और सहबाला की थाली को बदला। दूल्हे की थाली को सहबाला की तरफ तथा सहबाला की थाली को दूल्हे की तरफ कर दिया। दूल्हे ने थाली की तरफ हाथ नहीं बढ़ाया। सभी लड़कों को परोसा गया लेकिन किसी ने खाना शुरू नहीं किया। भाव यह था कि पहले दूल्हा खाएगा तभी हम खाएंगे। तब तक एक आदमी ने बुलेट गाड़ी की चाबी और एक सोने की अंगूठी और हार सहित एक घड़ी रखा गया। अन्य रिश्तेदार उसके थाली के सामने पैसा रख रहे थे। दूल्हे ने अपनी तरफ से मुँह न खोला और थाली की तरफ हाथ बढ़ाया। जैसे उसे कलेवा दिखने में स्वादिष्ट लग रहा था लेकिन चबाकर खाने में विश्वास किया। पहले मिट्ठा खाया। फिर पूड़ी के साथ दही भी खाया और फिर मिट्ठा भी खाया। दो चार कलेवा खाने के बाद दूल्हे का मन संतुष्ट हुआ। अपना हाथ रोक दिया था। थाली में कुछ भोजन शेष रह गया था। साथ के लोगों ने भी माँ, बहन, बुआ, मौसी की गाली सुनते हुए कलेवा समाप्त किया। दूल्हा और सहबाला के हाथ को दूसरे पात्र में धुलवाया गया। सभी दूल्हे के संगी साथी साथ उठे और साथ बाहर निकलकर चले गए।

कलेवा समाप्त हो चुका था। बाहर के बरातियों ने नाश्ता कर लिया तब घरातियों ने नाश्ता करना शुरू किया। आद्या की माँ ने कॉफी और हलुआ के साथ एक प्लेट में कचौड़ी और सब्जी लेकर आद्या पास पहुँची। आद्या सफेद कपड़े में हल्दी मिश्रित चावल और दूब को एक गाँठ में रखकर बाई कलाई पर बांधे हुई थी। वह साड़ी में थी और चुनरी ओढ़कर अपने को पूरी तरह ढककर शोक प्रकट कर रही थी। उसका उठना बैठना रहना जैसे चारपाई को भारी पड़ रहा हो। वह अपने होठों को अन्दर लेकर दबा रही थी। मानो वह अन्दर खुद से संवाद कर रही हो। आँसू खत्म हो चुके थे। एक बेबस चुप्पी बची थी।

माँ बोली – हे उठ । नाश्ता कर ले पिछले दो दिन से कुछ नहीं खाया है। (हाथ से उसे हिलते हुए) उठ रे।

आद्या ने नरम भाव से कहा – मुझे मत खिलाओ (बिस्तर में सिमटते हुए) मुझे मर जाने दो।

माँ घूरकर देख रही थी। लेकिन कुछ कह नहीं पा रही थी। सम्मान बचाने के लिए आद्या से भिड़ना नहीं चाहती थी। बगल रखे स्टूल पर नाश्ते की थाली को रखकर कहा – भूख लगे तो खा लेना। आद्या – मैं नहीं खाऊँगी। तुम्हीं खा लो। वह भोजन में खुद का कैद देख रही थी। इसलिए भोजन का विरोध कर रही थी।

अस्सी वर्षीय दादी माँ अपने टेकने वाले डंडे के साथ दरवाजे पर खड़ी सब सुन और देख रही थी। उनका शरीर की मांसपेशियां ढीली ढाली थी लेकिन जुबान कसी हुई थी। हाथ में लाठी लिए हुए और बायाँ हाथ चमकाते हुई बोली – भैया दीनानाथ ने इसे पढ़ाकर बर्बाद कर दिया एक हमारा समय था। अपने बाप दादा के सामने मुँह नहीं खोल सकते थे। और एक ये समय है कि कटर कटर बात सुननी पड़ रही है। अगर मैं समर्थ होती तो इसके पीठ पर दो चार लगाए बिना छोड़ती नहीं।

आद्या – डंडा लगाने से शांति नहीं मिलेगी। सीधे मार ही डालो न। आद्या ने घर के अंदर से बिना जुबान दबाए बोली।

दादी माँ को आद्या का जुबान ऐसा लगा कि मानो सीधे दिल पर घाव कर दिया हो – हमारे बुढ़ऊ होते तो तुम्हारी जुबान काट लेते। वे मर्द थे। दीनानाथ जैसे नहीं थे। एक तो मैने उसको पढ़ाया और उसने तुमको पढ़ाया। तब ये हालत है।

आद्या – मुझे पैदा होते ही क्यों न मार डाला गया। क्यों मै जानवर बनकर रहूं?

दादी माँ के दिल में बने घाव को इस बार आद्या ने तो नमक ही डाल दिया। लेकिन समर्थ न होने के अभाव में सब सहन करती गई। विदाई का समय आएगा तो देखना दूल्हे से कह दुँगी कि अगर इसका चाल खराब देखना तो इसे जी भर पहले मार लेना। हमारा घर परिवार कुछ नहीं बोलेगा।

आद्या – हाँ हमारा तो जन्म ही हुआ है दूसरों का मार-गाली सुनने को।

दादी माँ ने अपने लाठी के सहारे थोड़ा मुड़ी जिधर दो चार मेहमान बैठे थे फिर बोलना शुरू किया – दो चार जितने लोग हो यहाँ पर सुन लो कि देखो मेरे मरने पर इसे मिट्टी मत देने देना। अगर इसने दे दिया तो मैं यह बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगी।

आद्या की चाची ने दोनों को संभाला। वह समझ गई कि यह ताकत से नहीं झुकेगी। उससे आराम से बात करना चाहिए। अभी बच्ची है। कुछ नहीं जानती है। माँ तुम सहमत हो जाओ वह अभी नई खून की है। चाची अन्दर प्रवेश करके पलंग के कोने पर जा बैठी। जिस तरफ उसका पैर था ताकि आमने सामने से बात की जा सके। कहने लगी देखो बेटा विवाह सबका होता है। भगवान का भी विवाह हुआ था। इतना मेहनत इतने परेशानी के बाद एक लड़का मिल है। माता पिता पिछले कई दिनों से दो घंटे की नींद भी नहीं लिए है। और विवाह में कितना खर्चा होता है। तुम तो जानती ही हो।

आद्या – हमने नहीं कहा था विवाह करने को। मैं नहीं चाहती कि कोई मेरे लिए परेशान हो। मुँह के बल लेटी हुई बोली तकिये में मुँह छिपाते हुए फफक पड़ी।

चाची प्रेम भाव से बात करते हुई बोली – क्या तुम्हारे माता पिता ने तुम्हारे कहने से तुम्हे पैदा किया। क्या तुम्हारे कहने पर तुम्हे खिलाया पिलाया। हमेशा सुरक्षा का ख्याल रखा कि कहीं हमारे बेटी को कुछ हो न जाए। खुद दुख सहा लेकिन तुम्हारे ऊपर आंच न आने दिया। तुम्हे पढ़ाया लिखाया ताकि जिंदगी को जानो समझो ताकि कोई दिक्कत न आए। इतना सुनते ही वह थोड़ी हिली और अपने कपड़े को संभाला फिर उठकर बैठ गई और चाची की तरफ मुँह करके जोर-जोर से रोने लगी। क्यों मुझे मजबूर किया जा रहा है। मैं भी तो अपने जिंदगी की मालिक हूँ। क्या मेरी इच्छाओं को नजरअंदाज किया जा रहा है। चाची समझ गई कि यह मामला अंत तक नहीं कटेगा। इसलिए वह आराम से उठकर बाहर चली गई। बुआ ने बहुत सुनकर समझ गई थी कि घर में क्या चल रहा है। आद्या के खिलाफ उनके मुँह से निकल पड़ा। बिटिया अब गऊ नहीं रही। सांड हो गई है। उनके पास बड़े बड़े सींग है। जैसे जैसे बड़ी होती जाएंगी यह सींग बड़ा होता जाएगा। लड़ते झगड़ते समझते समझाते दोपहर हो गया। वह धीरे धीरे निर्जीव होती जा रही थी। हालत ऐसी कि जब वह सिसकती तो जान पड़ता कि जीवित है।

किस्से कहा जाय। कोई सुनने वाला नहीं है। यहाँ तो सब वक्ता है। यह सोच सोच कर वह कभी कभी थोड़ा सिसक पड़ती।

दिन बीता शाम ढली। आद्या विदा होकर ससुराल आ गयी। गाड़ी दुल्हा दुल्हन सहित द्वार पर खड़ी है। आसपास के लोग इकट्ठा हो गए है। गाँव के बच्चे मार्शल के चारों ओर घूम फिर रहे है। दूल्हे के अन्दर इस बात की अकुलाहट है कि सभी लोग उसी को देख रहे है। दुल्हन की माँ ‘मड़यतिन’ पीला साड़ी पहने हुए अपने साजो समान के साथ बाहर आई। उनके साथ उनकी दो बहने एक बेटी और दो देवरानी थी सभी लोग गीत गा रही है –

महेव पेरी होइके निकारी मड़यतिन

परछ लियो दुल्हा परछ लियो दुल्हिन

सरव गुन आगर घर ही के डागर।

मड़यतिन के हाथ में सूप है। सूप में एक जलता हुआ दीपक और एक लोटे में गुण और तिल का मिश्रित पानी है साथ ही मथनी, लोढ़ा, पहरुआ और बेलन। इन सब को मड़यतिन की साथी लोग अपने हाथ में संभाले हुए है। दूल्हे की माँ ने लौटे के पानी को हाथ में लेकर मार्शल में बैठे दुल्हा दुल्हन के सिर के चारों ओर घुमाया फिर सूप में लगाया। उसके बाद फिर उनके सिर के चारों ओर घुमाया और सूप में लगाया ऐसा उन्होंने लौटे को पाँच बार घुमाया और सूप से लगाया। ऐसे ही उन्होंने चारों वस्तुओं को परोछा । अंत में उन्होंने सूप को भी परछा। मड़यतिन के हाथों ने सत्ता हस्तांतरण का परिचय दिया। अब मैं धीरे धीरे सत्ता छोड़ रही हूँ। गृहस्थ तुम्हे संभलना है। इन्ही सब साधनों के बीच तुम्हारी जिंदगी कटेगी। जब परछने का रश्म पूरा हुआ तो मड़यतिन ने लौटे के पानी को घर से दूर ले गई। और पूरब दिशा में मुँह करके अपने देवता का नाम लेते हुए पानी को उड़ेल दिया। फिर आकर मार्शल का गेट खोला। बुआ ने दुल्हन को संभालते हुए अन्दर ले गई। ले जाकर गृह देवता के सामने बिठा दिया। दुल्हन के साड़ी के एक कोने को दूल्हे के अंगोछे के कोने को आपस में बांध दिया। बुआ ने एक बड़े पात्र में चूना मिला हुआ पानी लेकर आई। उसमें एक पायल डाल दिया और बुआ ने कहा – तुम दोनों को पायल खोजना है। देखना यह है कि पहले कौन पायल खोजकर लाता है। पायल को पानी के पात्र में डाला गया और पायल डूब गया। दूल्हा ने पायल को डूबते हुए आँखों से देखा लेकिन दुल्हन नहीं देख पाई क्योंकि वह घूँघट में थी। दूल्हा हाथ बढ़ाकर खोजने लगा लेकिन दुल्हन माटी की मूर्ति के समान बैठी रही। उसने अपना हाथ आगे नहीं बढ़ाया। बहुत कहने और डांटने के बाद आधे मन से संकोच के साथ अपना हाथ आगे बढ़ाया। तब तक वह हार चुकी थी। तब तक दूल्हे ने पायल खोज लिया था। ऐसा तीन बार हुआ और वह तीनों बार हार गई। आद्या ने इस हार को दिल से न लिया। अपने आप पायल रश्म सम्पन्न हुआ।

भोजन बनाने और भोजन कराते हुए आधी रात बीत गया था। रिश्तेदार भोजन करके रहने के लिए अपनी अपनी जगह जा चुके थे। कुछ लोग छत पर जा चुके थे। कुछ लोगों के लिए चारपाई द्वार पर लगा दी गई थी। अंत में दूल्हे की माँ ने दूल्हे रंजीत को बाहर का द्वार बंद करने का आदेश देकर अपना सामान लेकर छत पर चली गई। घर पूरा शांत और खाली हो गया। रंजीत ने बाहर का दरवाजा बंद किया। दूसरे कमरे का दरवाजा और लाइट को भी बंद किया। फिर अपना तौलिया हाथ में लेकर और एक स्टील के मग में पानी साथ में दो गिलास लेकर रंजीत ने कमरे में प्रवेश किया। कमरे में घुसते ही पलंग की शोभा कुछ और देखा। दुल्हन का कपड़ा चमक रहा था। सिर से ओढ़े चुनरी को संभालते हुए मेहंदी से सुसज्जित हाथ दिख रहे थे। वह स्वत: अपने तरफ खींचने वाला दृश्य था। ऐसा लगा कि कलाकार ने अपनी कला का जाल बुनकर उसके हाथ बांध दिया हो। वह हाथ पकड़कर देखना चाहता था कि यह जाल है या आकर्षण। या आकर्षण का जाल। कि प्रकृति की कला हाथ की बनावट क्या है? क्या वह मेरे हाथों जैसा है? रंजीत को अलग ही अहसास हुआ। वह विचार शून्य हो चला था। उसके अंदर आत्मसमर्पण के भाव से उसका शरीर शिथिल हो चुका था। उसके कमर से होते हुए पीठ पर एक गुदगुदी दौड़ गई। उसने अपने साँसों को संभालते हुए कहा। यहाँ शांति में चूहे बहुत दौड़ते हैं जरा संभल के रहना। ये हाथ पंखा ले लो यहाँ लाइट बहुत कटती है। यहाँ की गर्मी तुम्हे पका देगी जैसे भूसे में कच्चा आम में पकता है। इतना कहकर थोड़ा सा हँसा। रंजीत चाहता था कि वह कुछ बोले पर वह कुछ न बोली। रंजीत ने मग और गिलास को टेबल पर रख दिया। टॉवेल को पलंग पर डाल दिया। जैसे ही लाइट बंद करने वह दूसरी तरफ मुड़ा। तब तक आद्या खड़ी हो गई। और चुनरी सिर से उतार कर पलंग पर रख दी। वह धीरे से पलंग से उतरी और साड़ी एक पल्ला उतार दिया और थोड़ा सिर उठाकर बोली – ‘देखो जो करना है कर लो। इसके बाद चलो मुझे स्टेशन पर छोड़ आओ। मुझे लखनऊ जाना है। मैं अपना सब कुछ किसी और को पहले से ही हार चुकी हूँ।’ चंद्रमा को देखकर समुद्र की लहरों के समान ऊपर उठी हुई रंजीत की उमंगे अब सतह से टकराकर चोटिल हो चुकी थी। ऐसा लगा मानो गर्म शरीर पर किसी ने पानी डाल दिया हो और उसका शरीर शीतल होने के बजाय गर्मी खो देने पर मन क्रोध से भर गया हो। लेकिन कुछ करने की इजाजत सुनकर उसका मन शांत हो गया। आद्या खड़ी थी। रंजीत को कुछ समझ में न आया कि क्या करे? पहले उम्मीद और वास्तविकता के टकराहट को समझे या आद्या के सवाल का जवाब दे। उजाले में उसके आँखों कि चमक कहीं खो गई थी। रंजीत ने कहा कि पुराने कपड़े रखी हो। आद्या को यह आश्चर्यजनक लगा। उसने ऐसे उत्तर की आशा ही नहीं की थी। उसने कुछ न बोला। रंजीत ने कमरे से बाहर निकलकर अपने बहन का पेंट शर्ट ले आया। फिर पूछा टिकट है कि नहीं। आद्या का जवाब इस बार ‘नहीं’ था। रंजीत ने पूछा कि फिर कैसे जाओगी? उसने कहा कि कोई भी ट्रेन लगी होगी उसी में बैठ जाऊंगी। आद्या ने अपने गहने उतार कर रख दिया और कहा कि अगर मेरे पापा आते है तो उन्हें दे देना। रंजीत न निराश था न खुश था। आज दूसरे के माध्यम से खुद के पहचान को जानना चाहता था। लेकिन मन का प्रयोग पूरा न हुआ। उसके पास न विचार था न कोई भावना। बस एक चीज था कर्म का भाव। वह खुद को हारा हुआ महसूस कर रहा था। जो सारे उत्सव का केंद्र थी। उसका मन कहीं और है। काश ये सब न होता। बीस पच्चीस साल का समय। दुनिया भर का मेहनत और पैसे का खर्चा और न जाने क्या क्या? माता पिता जानेंगे तो उन पर क्या गुजरेगी। मैं जानता हूँ जिस तरह मैं अपने बारे में सोच रहा हूँ वह भी अपने बारे में सोच रही होगी। अब आद्या तैयार हो चुकी थी। पहले रंजीत द्वार पर निकला और देखा कि एक रिश्तेदार जाग रहा था। उसने पूछा क्या हुआ? तुम कहाँ जा रहे हो? इसके बाद मेहमान ने एक अजनबी लड़की को निकलते हुए देखा। रंजीत ने बाइक को निकालकर आद्या को पीछे बैठाया। रिश्तेदार ने कहा – तबियत गड़बड़ है क्या? रजीत – ‘हाँ’ ऐसा ही समझो। पिता जी से बोल देना मैं एक घंटे में आ रहा हूँ। रिश्तेदार – अगर दिक्कत हो तो मैं भी चलूँ? रंजीत ने निराश भाव से कहा – नही चाचा। बस एक घंटे की बात है। रंजीत ने गाड़ी आगे बढ़ाया।

दोनों स्टेशन पर पहुँचकर सामान्य टिकट लेकर प्लेटफॉर्म की तरफ बढ़ रहे थे। छिटपुट कुछ लोग इधर उधर आ जा रहे थे। कुछ एक तरफ बैठकर इंतजार कर रहे थे और एक तरफ लगी गाड़ी पर चढ़ रहे थे। एक दो दुकाने ही खुली दिख रही थी। प्लेटफॉर्म पर लखनऊ के लिए एक ट्रेन लगी थी। उसके चलने में एक घंटा बाकी था। स्लीपर के डिब्बे के समाने दोनों रुके। दोनों ने एक दूसरे को देखा। रंजीत ने जेब में हाथ डाला और पर्श कुछ पैसे निकालकर आद्या की तरफ बढ़ाया और कहा – ये रास्ते का खर्चा रख लो। आद्या ने कोशिश करने के बावजूद अपनी भावनाओं को छलकने से न रोक सकी। उसके आँखों से आँसू बहने लगे। जो थमने का नाम न ले रहे थे। बीच बीच में घिग्घी बंधी जा रही थी। आद्या ने हाथ में पैसा लेते हुए कहा- इस दुनिया में कुछ भी निश्चित नहीं है। यहाँ अपने लोग पराए हो जाते है और पराए लोग अपने हो जाते है... मैं तुम्हे याद रखूंगी रंजीत। रंजीत शांत था। जैसे आद्या ने पैसे हाथ में लिया। उसने एक क्षण बाद उसे देखते हुए दो कदम पीछे हटा। फिर पीछे मुड़कर चल दिया। रंजीत प्लेटफॉर्म पर उसे अकेला छोड़कर लौट रहा था। आद्या उसे लौटते हुए देख रही थी कि शायद अब उसका सपना सच्चाई में बदल जाएगा। अब उसे जाधव के साथ मिलकर अपने बारे में स्वयं सोचना था। अब उसे अपना भविष्य स्वयं बनाना था। उसे अपनी जिम्मेदारी स्वयं लेनी थी। उसने आराम के बदले जोखिम को चुना। यह बड़े साहस का काम था। उसने मोबाइल खोलकर देखा तो जाधव का संदेश आया था जिसमें लिखा था मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ और आगे भी करता रहूँगा। जब तक तुम आ नहीं जाती।‎ आद्या ने अपने आँसू पोंछे। उसकी भावनाएं कम हुई और मन ने सुकून का अनुभव किया।

मेवालाल शोधार्थी हिन्दी विभाग BHU वाराणसी


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