सत्तू (कहानी) ~ मेवालाल
जब दिशाएं नहीं जगती थी तब मुरली बिस्तर से उठकर नित्य क्रिया कर्म करके अपने भैंस के गोबर पानी में जुट जाता था। ताकि सुबह होने तक घर का काम समाप्त हो जाए और खेत पात का काम शुरू हो जाय। पत्नी चंदा थोड़ा देर से उठती थी । लेकिन वह भी दिन और रात के आलिंगन में ही अपना चूल्हा चौका समाप्त करके वर्तन मांजती थी। ताकि सुबह होने तक पति के साथ खेत के काम में हाथ बटा सके। दोनों लोगों द्वारा घर का काम समाप्त होते होते तारे अपनी चमक खो देते थे। पक्षियों का कलरव आसपास पेड़ो पर शुरू हो गया था। जिसमें सभी चिड़ियों का अपना अपना ढपली अपना अपना राग था। कोई एक चिड़िया एक राग छेड़ती तो दूसरी चिड़िया उसका अनुसरण न करती बल्कि अपना राग जपने लगती। इसलिए कुछ साथी पेड़ छोड़कर उड़ जाती। कि मुझसे गाना नहीं हो पाएगा और अनुसरण भी नहीं हो पाएगा। फिर भी कुछ शेष चिड़िया थी जो भावहीन और लयहीन गाना गुनगुना रही थी। वे जान रही थी कि इंसान हमारे इस गीत में रुचि लेते है। लेकिन इंसानों को सब मिलाकर खिचड़ी राग सुनाई दे रहा था। इधर उधर दौड़ लगाती अन्य चिड़िया पेड़ पर बैठती और कुछ विचार विमर्श कर उड़ जाती। मानो सभा करके आपस में बात कर रही हो कि आज किस खेत में दाने मिलेंगे और आसपास पानी पीने की व्यवस्था है कि नहीं। जमीन पर उतरकर भोजन चुनने लगी थी।
गेहूं, अरहर, चना, जौ, सरसों के सुनहरी फसल कट चुके थे। अब खेतों में जगह जगह भूसे दिखाई दे रहे थे। चारों तरफ घास युक्त जमीन दिखती थी। मानो धरती फसल की बोझ से मुक्त होकर हरे रोएंदार चादर ओढ़कर आराम कर रही है। अब वह अगले मौसम मे उठेगी। आम के बगीचों में बौर रूपी कच्चे माल को सूरज की तल्ख धूप ने तपाकर उसको छोटे छोटे टिकोरे में बदल दिया है। किसी पेड़ के नीचे बैठकर आराम करने या बगीचे से गुजरने पर कसैली गंध आती है। जो मन को अलग आनंदित भी करती है। आज सुबह के वातावरण में कुछ अलग निस्तब्धता थी। सामान्यतः गाँव के लोग धीरे धीरे उठ रहे थे और शांत वातारण में लोगों की बातचीत घुलने लगी है। गोबर पानी सानी समाप्त करके हाथ पैर धुलकर मुरली घर के एक कोठरी में कटोरे लेकर गया। और कटोरे में गुड़ लेकर आया और बैठकर खाने लगा। चंदा ने आकर एक लोटा पानी उसके सामने रख दी । गुड़ खाकर उसने आधा लोटा पानी पिया। उठकर खड़ा हुआ चप्पल पहनता हुआ बोला – हे सुन रही है रे। मैं तुम्हारा झाला लेकर जा रहा हूँ। तुम जल्दी आना। नहीं तो अगर पुरवइया चलने लगेगी तो भूसा नहीं ढोया जाएगा। मुरली ने सिर पर पगड़ी बांधा और दो झाला को मोड़कर अपने बाएं काख में दबा लिया। हाथ हिलाते हुए खेत की तरफ चल दिया।
चंदा वर्तन धोकर घर के भीतर आई और चूल्हे के बगल में रख दिया। तब तक उसका बेटा राजू जाग चुका था - बेटा कपड़े उतारो और जाके नहा लो। आज सत्तू है। राजू चारपाई के बगल में यथावत खड़ा रहा फिर बोला – आज मामा आएंगे? चन्दा – नहीं! मामा करवा को आते है। सत्तू को नहीं। यह खेत के फसल का त्योहार है। चंदा ने कहा - जाओ बेटा देर न करो। वहाँ पर बाल्टी भरा पानी रखा है। मुझे घर का काम निपटाकर भूसा ढोने जाना है। राजू नहाने चला गया।
चंदा घर में गई और एक बड़े पात्र में गेंहू का पिसान निकालकर लाई। जमीन पर बैठकर तीन छोटे छोटे वडिया में बराबर पिसान निकाल कर रख दिया। पिसान की मात्रा लगभग तीन तीन अंजुली थी। उसमें एक एक मुट्ठी नमक रखा और लगभग दो तीन मिर्च। इसके सिवाय सिक्को का पाँच पाँच रुपया रखा। पिछली बार उसने दो दो रुपया रखा था। लेकिन इस बार अपनी भावनात्मक संतुष्टि को बढ़ाने के लिए पैसे में वृद्धि कर दी थी। तीनों पात्रों के सीधे को ढककर एक तरफ रख दिया। इसके बाद चारपाई पर बिछाए गए बिछौने को मोड़कर गुड़वारी की तरफ रखा। भीतर गई फिर निकली और अपना कपड़ा व्यवस्थित करने लगी। तब तक राजू नहाकर कमर में अंगोछा लपेटे हुए आया। चन्दा ने कहा –‘पूरब मुँह करके बैठ जाओ और सीधा छू लो। वड़िया में रखा है।’ फिर अपने आप से कहा - ‘अभी दाल भी सुखाना पड़ा है। गेंहू ओसाना है। दाल बनाना है। नाद में पानी डालना है। क्या करूँ क्या न करूँ।’ हे राम इतना कहकर वह अपना कपड़ा हाथ में लेते हुए नहाने के लिए चली गई। राजू पूरब मुँह करके बैठ गया। एक पिसान से भरे एक वड़िया को अपने आगे किया और ढके पात्र को हटाया। हाथ जोड़कर और जोड़े हुए हाथ को पिसान को छूते हुए माथे पर लगाया। पुनः इस क्रिया को दोहराया और पुनः इस क्रिया को दोहराया। तीन बार माथे पर लगाने के बाद उसने सीधा छूने के रीति को पूरा किया। अन्न का संबंध शरीर से है। यह जीवन का आधार भी है और विनाश का गंतव्य भी। ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक अन्न वाला सत्तू त्यौहार। जहाँ किसी पुरोहित की जरूरत नहीं है। न किसी प्रकार मंत्र जाप की। यह हमारे कर्म से जुड़ा हुआ है। सादगी से भरा जो हमारे क्रिया कलापों में सम्पन्न होता है। परिवार का हर एक सदस्य भागीदार होता है। राजू ने सीधा छूकर अपनी भागीदारी पूरी की।
राजू की अम्मा तब तक नहा कर आ गई थी। साड़ी पहनकर उसका पल्लव बना रही थी कि उन्होंने आवाज लगाई। राजू कहाँ हो तुम। आओ सत्तू खा लो। राजू द्वार से आया। अम्मा ने पूछा कहाँ गए थे तुम? राजू - बस द्वार पर खड़ा था। कल्लू मुझे खेलने के लिए बुला रहा है। अम्मा ने कहा पहले सत्तू खा लो फिर जाके खेलों। चन्दा ने साढ़ी के एक शिरे को सिर से ओढा और आँचल आगे किया और साढ़ी पहनकर तैयार हो गई। फिर जाके जमीन पर सिर ढककर पूरब दिशा में मुँह करके बैठ गई। पिसान के वड़िया को आगे किया और सीधा छुआ। चेहरे पर भक्ति और कृत्यज्ञता का भाव था। जीवनदायिनी धरती के प्रति सम्मान था। आँखों में श्रद्धा मानो वह अन्न को देवी के रूप में नमन कर रही हो। माँ तुम्ही मनुष्य के उदर में निवास करती हो। लोगों को ऊर्जा देती हो। माँ तुम हमे और हमारे परिवार को जीवन प्रदान करो।
आँगन में धूप आ गया था। पूरब वायु मंद मंद चलना शुरू हो गया था। चंदा ने सिल बट्टे पर खटाई की चटनी पीसकर कटोरे में लाई और जमीन पर रख दी। इसमें खटाई के साथ थोड़ा सा नमक और मिर्च भी मिला हुआ था। ऊपर से सिल बट्टे का स्वाद भी। कि मुँह में पानी आ जाय। और न मिलने पर मन का पश्चाताप। चंदा ने पीढ़ा खिसकाकर बैठ गई और एक पीढ़ा अपने बेटे के सामने रख दिया। एक प्याज के टुकड़े को उसने हंसिया से चार टुकड़े किए। प्याज को काटते हुए उसकी आँखें नम हुई मानो प्याज के परतों के समान उसकी अनकही कहानी दबी थी जो थोड़ा मौका पाकर उभर आई। ताकि लोग देखे और समझे। पीढ़ा पर राजू एक शिष्य के समान बैठ गया मानो सब अपनी माँ के सानिध्य में सीखना चाह रहा हो और वह यह सब सीख कर बड़ा होगा। चंदा ने चावल बनाने वाले पात्र में गुड़ और पानी शाम को ही भिगो के रख दिया था। ताकि गुड़ पानी में अच्छे से घुल जाए। चंदा ने जौ की सत्तू को दो दिन पहले ही तैयार कर लिया था। चंदा ने जौ की सत्तू को अपने और राजू के थाली में रखा। फिर गुड़ के रस को उड़ेला। रस थाली में गिरकर यादों के समान बिखर गया। और चारों ओर ऊँची दीवार की सीमा पाकर प्रवाहमान जिंदगी ठहर गई हो। जीवन रूपी रस ने समाज रूपी थाली का फ्रेम ग्रहण किया। सत्तू को रस में मिलाने के लिए उसने थाली में हाथ डाला। राजू की भी थाली तैयार की। अब निर्जीव खाद्य पदार्थ को मानवीय कर्म ने ऊर्जा में बदल दिया। सत्तू भोजन के रूप में तैयार हो गया। दोनों सत्तू खाने लगे। सत्तू को मुँह में डालते फिर प्याज का टुकड़ा और बीच बीच में निवाला को चटपटा बनाने के लिए खटाई की चटनी भी चाटते। इस छोटे से दृश्य में ममता सादगी और लोकजीवन की गुड़ के समान मिठास भी है। मौसम के अनुकूल सादा भोजन। आस्था और स्वस्थ का संगम। श्रमशील समाज के श्रम का प्रतीक। जो श्रम करेगा वह पेट भर खाएगा। इतने में राजू ने पूछा कि बप्पा ने सत्तू खाया कि नहीं? चंदा - जब वे भूसा ढोकर आयेंगे तब खायेंगे। राजू सत्तू चुलबुलाते हुए - शाम को क्या बनेगा? चंदा ने बड़े सरलता से कहा कि शाम को पूड़ी बनेगा। राजू - तब मैं खाऊंगा। चंदा - हाँ बिल्कुल खाना मैं तुम्हारे लिए ही तो बनाऊंगी। राजू - अम्मा मेरे लिए वो तीन कोन वाला पूड़ी बना देना। चंदा ‘हाँ’ कहती कि वह फिर बोल पड़ा कि बप्पा के लिए तीन कोन वाला पूड़ी मत बनाना। वे गोल पूड़ी खाते है। चंदा ने थोड़ा सा हँसते हुए कहा कि ठीक तुम जैसे कहोगे वैसा ही करूंगी। बातें करते हुए चंदा और राजू दोनों अपना सत्तू समाप्त कर चुके थे। राजू ने थाली में हाथ धुलकर अपना खेलने का सामान इकट्ठा करने लगा। चंदा ने भी अपनी थाली में हाथ धोया। लोटे से पानी पिया। राजू के थाली को अपने थाली मे रखा। फिर दोनों थाली उठाकर आंगन में रख दिया। जमीन पर गिरे जूठन को बढ़नी से साफ किया। साफ करके बढ़नी को चारपाई के नीचे रख दिया। बस थोड़े समय के लिए अपना चेहरा दर्पण में देखा फिर आगे बढ़ी और बाहर निकलते हुई बोली – राजू, मै भूसा ढोने जा रही हूँ। कहीं मत जाना। अपने द्वार पर खेलना और घर देखना। मैं जा रही हूँ। इतना कहकर चंदा चली गई।
सूरज के आठ हाथ ऊपर चढ़ते चढ़ते मुरली और चंदा काफी भूसा ढो चुके थे। आज धूप में काफी गर्मी थी। अब भैंस चराने का समय भी हो गया था। घर पहुँचकर मुरली और चन्दा ने अंतिम भूसा भरे झाला को कोठरी मे रखा और चन्दा के झाले का भूसा भी रखवाया। मुरली पगड़ी खोलकर शरीर पर चिपके भूसा को झाड़ने लगा। चन्दा झाला समेटने लगी। अँगौछा मुरली के साथ था ही इसलिए घर से निकलकर नहाने के लिए नदी की तरफ बढ़ गया।
जब नहाकर आया तब उसने भी चन्दा और राजू के समान सीधा छुआ और पीढ़ा लेकर सत्तू खाने बैठ गया। चंदा ने सत्तू परोसा। साथ ही खटाई की चटनी और प्याज भी लगा दिया। उसने चटकारे लगते हुई सत्तू खाया। सत्तू खाने के बाद वह उठा और आर्गनी पर टंगी अपना पैंट और शर्ट उतारा और शरीर पर धारण किया तथा अंगोछे की पगड़ी बांधा। बगल में रखे लाठी को उठाया और तैयार होकर भैंस के घर में गया और उसके पैरों की रस्सी खोला। भैस ने अपनी पूँछ से अपनी देह को झाड़कर खुशी प्रकट की कि खूंटा से आजाद होने का मौका मिल गया। उसे दोह दोह कहकर हाँकते हुए चराने के लिए चल दिया। भैस ने गले कि घंटी बजाते हुए आगे चल दी। चलते हुए अपनी पत्नी को आदेश दिया कि कोठरी में रखे गेंहू को बोर में भरकर रख देना जब तेज हवा चलेगी तब ओसाना है। इतना कहते हुए कंधे पर लाठी रखा और पीछे चलते-चलते ड्योढ़ी लांघ गया।
दोपहर बीतने के बाद तीसरे पहर एक मुरली के घर एक बूढ़ी गुसाईन आई। छोटे से लाठी के सहारे चलते हुए। एक पुराना साड़ी पहने हुए जिसके किनारों में सिकुड़न थी। उम्र लगभग साठ साल। थोड़ा झुककर चलती थी। आते ही पुकारा ओ लड़के! ओ लड़के! हो घर पर। अंदर से चंदा की आवाज आई - हाँ हाँ हूँ। बैठो आ रही हूँ। गुसाईन दरवाजे पर बैठ गई और गठरी को अपने बगल में लगाया। फिर बोली राजू बेटा घर पर नहीं है क्या? बहुत दिन हो गया देखे हुए। चंदा – नहीं, आजी वह बाहर गया है। खेलने कहीं। अभी वह घर पर था। गुसाईन - अच्छा... ठीक रहता है न। हाँ आजी ठीक रहता है। चंदा ने घर में से ही उत्तर दिया।
चंदा ने तीनों सीधा को एक बड़े वड़िया में रखकर गोसाईन के सामने पहुँची। गुसाईन के पास पहुँचकर वाडिया को जमीन पर रख दी। अब कर्म धर्म से जुड़ा और धर्म कल्याण से। बूढ़ी गोसाईन नमक और मिर्च को वड़िया से निकाला और दो झोला अपनी गठरी से निकाला। उन दोनों झोले में नमक और मिर्च अलग-अलग रखा हुआ था। उन दोनों झोली में नमक और मिर्च रखा। चंदा खड़ी होकर पुनः झुककर पंद्रह रुपए वाला हाथ उसके तरफ बढ़ाया। गोसाईन अति प्रसन्न हुई। उसके लिए चन्दा कुछ पल के लिए अन्नपूर्णा देवी के समान श्रद्धेय बन गई। रुपया हाथ में लेते हुए गुसाईंन का जुबान आशीर्वाद के लिए खुला - तुम्हारा घर परिवार सुखी रहे। तुम्हारा बेटा सुखी रहे। भगवान तुम्हे पूत दे। घर खुशियों से भरा रहे। इतना कहते हुए उसने रुपए को माथे पर लगाया और फिर अपने कमीज के बगल के जेब में रख लिया। गाँव के अन्य घरों में उसे मात्र सीधा ही मिला था पैसा नहीं। दोनों का जुड़ाव बोल रहा था। देने से समाज में प्रेम करुणा और सहयोग को बढ़ावा मिलता है। आत्मसम्मान में वृद्धि होती है। मेहनत की चीज को देने की क्षमता सबमें नहीं होती है। जिसके पास होती है वह धनी होता है। उसके पास एक उपलब्धि होती है। वह अपने अवचेतन से मुक्त होता है। अंहकर में कम रहता है। प्राप्त अनाज को व्यवस्थित करके अपने झोली में डाल चुकी थी। गाँठ लगाते हुए गोसाईन ने बोला - रानी थोड़ा दाल हो तो दे दो। ये सूखा अनाज ही खिलाओगी। रानी शब्द सुनकर भी चंदा के अन्दर बड़ा होने का भाव न जगा। - आजी इस बार अरहर में कीड़े बहुत लगे थे। पश्चिमी वायु ने अरहर का नाश कर दिया। इस बार दाल नहीं हुआ है। गुसाईन - अरे थोड़ा सा दे दो एक ही पेट तो है। चन्दा - नहीं हुआ है तब क्या करे? अगली बार आना दे देंगे। गुसाईन - ठीक है रानी कहकर अपनी गठरी संभालते हुए अपनी बाएं कंधे पर टांग लिया और दाहिने हाथ से लाठी टेकते हुए खुशी खुशी दरवाजा लांघ गई।
शाम हो चुकी थी। सूरज डूबने वाला था। दिन भर के चहल पहल के बाद वातावरण शांत हो गया था। चरवाहे लोग अपना अपना गाय-भैंस लेकर लौट रहे थे। और पक्षी अपने घोंसले की ओर। दिन भर की परेशान करने वाली गर्मी घट चुकी थी। लेकिन जमीन से गर्मी निकलती हुई महसूस हो रही थी। इसके विरोध में हवा में थोड़ी नमी थी। चंदा अपने भोजन की सामग्री को तैयार करके शाम का भोजन बनाने में लग गई थी। सब्जी तैयार होने वाला था। पूड़ी के लिए गेंहू का आटा गूथ रही थी। राजू खेलकूदकर घर आया और अम्मा को पूड़ी बनाते देख बहुत खुश हुआ। और चूल्हे के बगल में बैठी माँ से चिपककर खड़ा हो गया।
मेवालाल शोधार्थी हिन्दी विभाग BHU
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