साइकिल (कहानी) ~ मेवालाल
वह पसंद के हर स्तर को समझना चाहता था। उसने बहुत सोचा कि वह पसंद के पीछे का पर्दा उठा दे और लोगों को बता दे कि लोगों की पसंद उनकी आंतरिक शक्ति का बाह्य रूप है। लेकिन यह समझने वाला कौन था? गर समझ भी जाय तो क्या उसकी स्थिति बदल जाएगी। नहीं न। यही सोचते हुए उज्ज्वल बस की पायदान पर खड़े होकर यात्रा कर रहा था। भीड़ से पैरों को बार बार समायोजित कर रहा था। वह अपने आप में जल रहा था और वह हीनताबोध से भरा जा रहा था। यात्रा लंबी न थी बस हेल्थ सेंटर से बिरला ब छात्रावास तक। उसने तय कर लिया था कि वह बस के पायदान पर खड़े होकर यात्रा नहीं करेगा। चाहे पैदल ही क्यों न चलना पड़े। या अत्यधिक समय क्यों न लगे। उसे इतना बुरा क्यों लग रहा था वह स्वयं नहीं समझ पा रहा था कि मस्तिष्क के दुनिया में क्या हो रहा है। सवाल उसके अंदर था कि उसका मन उसको सांत्वना क्यों नहीं दे रहा है। इतने में बिरला ‘स’ पर बस रुकी और उज्ज्वल वही उतर गया और पैदल बिरला ‘ब’ की तरफ बढ़कर चल दिया। फिर भी उसे सुख का अनुभव न हुआ। उसे सुरक्षा की चिंता न थी। अब उसे अपने बारे में जानने की जिज्ञासा प्रकट हुई। वह तार्किक था। वह इसे भावना से जोड़कर नहीं देख रहा था। लेकिन उसे यह सब सहज नहीं लग रहा था। उसे ऐसा लगा मानो उसके अंदर लोगों से आँख मिलाने की क्षमता नहीं है क्योंकि वह बस की पायदान पर खड़े होकर यात्रा करके आया है।
छात्रावास पहुँचकर उज्ज्वल साइकिल के बारे दो चार छात्रों से बात की कि किसी के पास पुरानी साइकिल हो तो बताओ। एक दो दिन साइकिल के लिए वह परेशान रहा। काफी छानबीन के बाद उसे एक पुरानी साइकिल एक पुराने मित्र सुमित के पास मिल गई। सुमित ने साइकिल चलाना छोड़ दिया था। उसे पैदल चलना ज्यादा पसंद था। सुमित ने साइकिल दिखाया जो बरामदे में खड़ी थी। जिस पर अत्यधिक धूल जमे थे। उसके टायर में काफी चिड़चिड़ापन था। रिम में जंग लगी हुई थी। गद्दी टूटी हुई थी। अगली वाली पहिए का ब्रेक नहीं था। शेष सब ठीक था। साइकिल देखकर उज्ज्वल का लगाव बढ़ गया था क्योंकि वह जैसा चाहता था साइकिल बिल्कुल वैसी थी। वही भारतीय डिजाइन की। छोटी सी। मतलब वह स्पोर्ट साइकिल नहीं थी। दोनों ने साइकिल के पास बरामदे में खड़े होकर बातचीत को आगे बढ़ाया।
सुमित ने बड़े सहज भाव से कहा – देख लो यही है मेरी साइकिल। हो सकता है टायर ट्यूब लगवाना पड़े। दो साल हो गए खड़े हुए। ताला तोड़ दो और दुकान पर ले जाके देखो।
उज्ज्वल – भाई ये बताओ ये ताला कैसे टूटेगा? जेब में हाथ डाले हुए सुमित की तरफ देखकर साइकिल की तरफ देखने लगा।
सुमित उज्ज्वल के बाएं कंधे को छूते हुए – स्टाफ लोगों से मिलों वो सहयोग कर देंगे।
सुमित जिज्ञासा वश पूछा - ये बताओ साइकिल से क्या होगा? बाइक ले लो या स्कूटर ले लो। इतना कंजूसी करके क्या करोगे?
उज्ज्वल ने गंभीरता से लेते हुए कहा - भाई तुम यह नहीं समझ पाओगे क्योंकि तुम जिस विभाग में पढ़ते हो उसकी गुणवत्ता घट गई है। हाँ अगर खुद से कोशिश करोगे तो यह समझने में तुम्हे दस साल लग जाएंगे।
सुमित ने जबड़े से चटकारा लेते हुए कहा - गजब का ज्ञान दे रहे हो। अरे कोई सेकंड हैंड ही गाड़ी ले लो।
उज्ज्वल ने गंभीर मन से सुमित कि तरफ देखते हुए बोला – मैं साइकिल चलाकर सरकार के सतत विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहयोग करना चाहता हूँ। वैसे यह बात पर्यावरण तक सीमित नहीं है।
सुमित अपने दोनों हाथ से अपने दोनों कानों को पकड़ते हुए - रहने दो भाई तुम्हारे ज्ञान से मेरा कान फट जाएगा और मैं अपना सिर पटक लुँगा। इतना कहकर सुमित चला गया। उज्ज्वल बगल में रखे कपड़े को उठाकर साइकिल साफ करने लगा।
उज्ज्वल को साइकिल चलाते हुए काफी दिन हो गए थे। वह साइकिल के पैडल पर जितना ऊर्जा खर्च करता था साइकिल उतना तेज गति से चलती थी। वह सभी काम अपना साइकिल चलाते हुए कर लेता था जितना कि उसके मित्र बाइक चलाते हुए कर लेते थे। लाभ यह कि पेट्रोल डलाने की दौड़ न ही सर्विसिंग की जरूरत। मन हमेशा वैचारिक समायोजन को तैयार रहता। समय बीतता गया। इसी बीच एक दिन शोध निर्देशिका के जन्मदिन का तारीख आ गया। उज्ज्वल अपने शोध निर्देशिका के फ्लैट में गया। साथ में उसके सहपाठी भी थे। पिंकी, धवन, संजना और समीक्षा। यह अवसर मात्र केक काटने तक सीमित नहीं था बल्कि साथ मिलकर खुशियों को साझा करने का अवसर था। अकेलेपन के खिलाफ सामाजिकता का निर्माण भी ऐसे ही होता है। ऐसे अवसर पर ही मनोभावों को व्यक्त करने का अवसर मिलता है जहाँ स्पीकर के गाने पर नृत्य करने का मौका उपलब्ध हो। पवन और संजना रसोईया बने हुए थे। बैगन पकाने के बाद पनीर की सब्जी बना रहे थे। समीक्षा और पिंकी सोफे पर बैठ कर गुब्बारा फुला रहे थे। धवन की विशेषता यह थी कि वह हमेशा अपने अच्छाइयों के बारे में दूसरों को बताता रहता था। संजना बहुत अच्छी थी कि वह सबको सुनती थी और अपनी कहती थी। पिंकी तर्कशील बहुत थी। जिससे गर बात शुरू हो जाए तो बढ़ती ही जाती थी। समीक्षा की विशेषता ये थी कि वह थोड़ा काम करके थक जाती थी । रसोई में खड़े होकर थक गई थी अब वह कागज का फूल सोफ़े पर बैठकर बनाने लगी। उज्ज्वल सर्व गुण सम्पन्न था। कहीं भी बिठा दो वह फिट हो ही जाएगा। अपने लिए आराम खोज ही लेगा। उज्ज्वल फूले गुब्बारे को दो तीन गुब्बारा जोड़कर दीवार से सेलो टेप लगाकर चिपकता जाता। दीवार पर सुनहरे रंग का झालर लगाया और सामने टेबल रखकर उस पर एक शीट डाल दिया। तभी संजना ने कहा कि भैया कुछ डिस्पोजल थाली और चम्मच की कमी पड़ रही। जाकर दुकान से ले आइए। उज्ज्वल - कितना लेना है? संजना के मुँह से आठ आठ सुनकर वह फ्लैट ने निकल गया।
उज्ज्वल अपने साइकिल को प्यार से लंबेरघिनी कहता था। वह अपने साइकिल को उतना ही महत्त्व देता था जितना लंबेरघिनी के मालिक लंबेरघिनी को। वह नीचे उतरा और अपने लंबेरघिनी पर सवार हुआ और पैडल के रूप में रेस को दबाते हुए आगे बढ़ने लगा। वही पुरानी साइकिल लेकर बड़े शान में निकला। करौंदी गेट पर पहुँचकर दाहिने होकर जैसे ही नरिया तिराहे की तरफ बढ़ा। उसके बाएं बगल से दो सवार बुलेट लेकर तेजी से नरिया तिराहे की तरफ निकले और कहा – मरना है क्या? जरा संभल के चलाया करो। उज्ज्वल ने तुरंत उत्तर दिया – हाँ पता है मुझे। आगे बढ़ती हुई बुलेट की रफ्तार कम हो गई। और कम होती गई। क्यों? एक अमीर आदमी अपने विषय में कुछ बर्दाश्त नहीं कर सकता है। क्या मजाल कि कोई अच्छी बात कह दे या आँख मिला दे। या कोई जवाब दे दे। जो कहे बस सुन लो। जब अमीर गरीब को सताएगा नहीं तब लोगों के समाने अपने गुणों को कैसे प्रकट करेगा। बुलेट का रफ्तार इतना कम हुआ कि उज्ज्वल सहज साइकिल चलते हुए उसके बराबर पहुँच गया। बुलेट वाला - क्या बोले हो? उज्ज्वल – जो सुने हो। दोनों एक ही दिशा में बढ़ रहे थे। बुलेट साइकिल की बाएं तरफ थी।
बुलेट वाला – अच्छा तुम मुझे गाली दिए हो। बुलेट की गति इतना मंद हो गई कि सवार दाहिना बायाँ पैर सड़क पर बारी बारी से लगाता जाता।
उज्ज्वल ने कहा ‘गाड़ी रोको।’ बुलेट एक तरफ रुक गई। वह उतरकर खड़ा हो गया। उज्ज्वल ने भी अपने साइकिल का स्टैंड लगाया और उसके तरफ एक कसी हुई चाल में बढ़ा कि देखने वाला समझ जाय कि उसके पास भी शारीरिक शक्ति है। साइकिल है तो क्या हुआ। वह अपने मानसिक शक्ति का प्रदर्शन करना भी जानता है। उसके अवचेतन मन ने कहा उसे पहले ही प्रयास में हरा देना। पिछला सवार के पहनावे से लग रहा था कि वह उसका नौकर है और कुछ सामान लेने के लिए आगे जा रहे है। मतलब उनका घर यही है। बुलेट सवार कद में उससे बड़ा और मोटा था। लेकिन उज्ज्वल के मन पर बुलेट और उसका भारी शरीर दबाव न डाल सकी। बुलेट चालक भी थोड़ा चलकर आगे बढ़ा।
उज्ज्वल पास पहुँचकर मजबूत और मंद स्वर में आँखों से आँखे मिलाते हुए – आप मुझ पर बुलेट का धौंस दिखा रहे हो। और आप मेरी औकात का अंदाजा मेरी साइकिल देखकर कर लगा रहे हो। साइकिल कि तरफ उंगली करते हुए कहा कि यह मेरी पसंद है मजबूरी नहीं। ऊर्जा का ऐसा प्रवाह जैसे बाढ़ से भरी गंगा अपनी शक्ति प्रदर्शन हेतु मंद गति से चल रही हो।
यह वर्चस्व और वर्चस्व की मानसिकता की लड़ाई थी। उज्ज्वल इसे चुनौती दे रहा था। बुलेट वाला झल्ला गया। उसके पास आगे बोलने के लिए जैसे कुछ बचा ही नहीं। दोनों अपने संपत्ति के घमंड में थे। एक के पास भौतिक संपत्ति तो दूसरे के पास बौद्धिक संपत्ति। उसके नौकर ने उज्जवल कि ताकत को भांप लिया था इसलिए उसका नौकर उसको लड़ाई करने से रोक रहा था। इधर उज्जवल भी लड़ने को तैयार था लेकिन पहले क्रिया की प्रतीक्षा कर रहा था।
बुलेट वाला अँगुली दिखाते हुए – मैं तुम्हारे अच्छाई के लिए बोल रहा था। तुम्हे पता है कि नहीं।
उज्ज्वल के पास अडिग पैर और स्थिर निगाहों के साथ बोला - बोलने का एक तरीका भी होता है। इसी चीज को अच्छे से बता सकते थे कि नहीं। दूसरी बात अच्छाई के नाम पर आप किसी को दबा नहीं पाएंगे। आपको यह पता होना चाहिए।
उसका नौकर उज्ज्वल से – रहने दो भैया। जाओ अपना काम करो।
बुलेट सवार ने पुन: दोहराया - सड़क पर अच्छे से साइकिल चलाया करो। ठीक है।
उज्ज्वल – अगर मैं गलती करूंगा तो मुझे कुचल देना मुझे मरने का डर नहीं है। कम से कम मुझे अपमान तो नहीं सहना पड़ेगा।
उसका नौकर उसे पीछे खींचने लगा। बुलेट वाले का घमंड टूट चुका था। वह सामान्य व्यक्ति पर विजय न प्राप्त कर सका। हारते हुए लौटना उसे भरी लग रहा था।
बुलेट वाला – कहाँ रहते हो तुम? मैं तुमसे फिर मिलता हूँ।
उज्ज्वल दाहिने हाथ कि तर्जनी उठाते हुए - बिरला ब छात्रावास। कभी जरूरत पड़े तो आ जाना।
बात करते हुए उज्ज्वल का शरीर भी बोल रहा था और बुलेट सवार का काफी जोर लगाने के बाद आवाज निकाल रही थी। यद्यपि वह जवान था। इस कमजोरी को उज्ज्वल भांप गया था कि अगर लड़ाई हुई तो मैं ही जीतुँगा।
इतने में वह गाड़ी पर बैठा और स्टार्ट करके आगे बढ़ गया। उज्ज्वल भी साइकिल को स्टैंड से गिराकर उसी दिशा में आगे बढ़ा। उज्ज्वल का सिर गर्म और भारी हो गया था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि यह भारीपन कैसे उतरेगा। उज्ज्वल अपने सिर के बोझ को बर्दास्त नहीं कर पा रहा था इतना अधिक कमांड ग्रहण करने के बाद कमांड वापस नहीं हो रहा था। वह कमांड विषम परिस्थितियों में मस्तिष्क की तैयारी थी। जैसे एक शांत और भोलेभाले व्यक्ति को हथियार से लैस करना। मन अशांत भले हो पर उसने चुपचाप सहनकर अपने आप को कोसा तो नहीं। यदि वह सहन करता तो भी मन तनाव में होता। लेकिन सहन नहीं किया तब भी वही बात। परिणाम बराबर है। निडर उज्ज्वल के मन मे चलते-चलते भय आ गया कि कहीं वह आगे मिलकर कोई बड़ा कदम न उठा ले। इतना सोचने पर भी उसकी निगाहे स्थिर होकर सामने देखती जा रही थी। सब ठीक रहा। चलते चलते वह ग्रॉसरी के दुकान पर पहुँचा।
जन्मदिन का जश्न समाप्त हो गया था। शाम ढल रही थी। उज्ज्वल अपने कमरे पर आया अपना कपड़ा उतार कर लोअर टी शर्ट पहना।जाकर वाशबेसिन में मुंह धोया और अपना चेहरा देखने लगा। बगल में टंगे तौलिए से मुँह पोंछा। वह पुन: गौर से खुद को देखे जा रहा था। मन तालाब के समान शांत था। लेकिन अंदर सवाल की कई धराये प्रवाहमान थी कि मैं कौन हूँ? और कितना हूँ? क्या मैं वह हूँ जिसे बुलेट वाला जानता था । या मैं वह हूँ जिसे मैं स्वयं जानता हूँ। क्या मैं उतना नहीं हूँ जिसका मैं दावा करता हूँ। एक पल के लिए उसे झगड़े की जगह अपने साइकिल की टर्निंग पॉइंट याद आई। कि कहीं उसने सच में गलती तो नहीं की थी। बस दर्पण में खुद को देख रहा था। कुछ जवाब न दिया। बस दर्पण में आत्म दर्शन। शायद उसने कोई लगती नहीं की थी इसलिए उसका मन शांत रहा। वह अपने भीतर के अवगुणों को स्वीकार करना चाहता था। वह कमरे में आया लेकिन विस्तर पर नहीं गया। मन कि शांति के लिए उसने गाना सुनना भी उचित न समझा। गुस्से भरे उज्ज्वल के मन में एक सवाल और कौंध रही थी कि मैं अपने अंदर की शक्ति को बाहर कैसे दिखाऊँ। अगर मैं यह नहीं कर पाऊँगा तो अपनी पसंद तक नहीं पहुँच पाऊँगा। जहाँ पर पहुँचने के लिए बड़े योग्यता और कुशलता की जरूरत है। उसका ध्यान अपने मेज पर रखे तिरंगे पर गया और उसने अलमारी में रखे तीन कोने वाला भगवा झंडा लिया और मेज पर से स्टैपलर उठाया। कमरे से निकला और अपने साइकिल के पास गया। साइकिल के हैंडल में झंडे को मोड़कर उसे स्टेपलर कर दिया। उसका अगला शिरा हवा में लटकने लगा। इससे उसके साइकिल की शोभा बढ़ने लगी।
मेवालाल शोधार्थी हिन्दी विभाग BHU
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