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Showing posts from November, 2025

बीएचयू प्राचार्यो पर (दोहा) – मेवालाल

  प्रेम यस उमर बाढ़े, बाते नव सोच अमेल। जहां परंपरा रूढ़ि हावी, शोभे प्रियंका झा अकेल।। संत स्वभाव ज्ञानी विनम्र, सहृदय सिंहासन श्रृंग। मुस्कान साझा छात्र मित्र, अद्भुत प्रभाकर सिंह।। पहिचाने धर्महि कर्महि जोड़े,अदमियत समताहि एक रूप। जौ नी के सब पहिने कहि, जनेऊ त्यागे वशिष्ठ अनूप।। स्वायत्तहि सोच व्यक्त, हित समता संवादए मेल। कहां बंजरहि फूल सम, किंगसन सिंह पटेल।। जाने सब विचार बनावे, मानवता प्रस्थिति बड़ राखी वादहि सत्यहि शक्ति सब, वाल्टेयर आशीष त्रिपाठी।। मंद गति निश्चित अव्यस्त, चले व्यवस्थापक एक दीदार। बाते अगर्व प्राप्ति अपरिग्राही, सामाजिक सदानंद साही सर।। जेहि सम्मुख वजूद रहे मान, न पदय मनोदृष्टि नेक। जीवन शैली संभ्रांत विरोधे, विंध्यांचल यादव एक। समताहि त्यागे रीति परंपरा, औ श्रेष्ठहि विचार। जन देशवाद परिपेक्ष्य मंह, राणा कुमार झा तैयार। मेवालाल शोधार्थी हिंदी विभाग बीएचयू वाराणसी यूपी पिन 221005, 7753019742

मुझसे तेरा नाम बड़ा है (गीत) ~ मेवालाल

  मेरी हैसियत क्या योग्यता कुछ नहीं उसके आगे कुदरत ने करिश्मा से उसे लम्बे समय में गढ़ा है। न सुनने और कहने के बीच मन दुविधा में बहुत है अन्दर है सृजन कला यह जीवन का बसंत ऋतु है। दिल को दिल से न जाने यहाँ उमर सिर पे चढ़ा है।/मुझसे तेरा नाम बड़ा है। मेरी उपस्थिति मे गर वह अपनी मूल्य जान पाये भावनाओं से सम्मानित करे मुझे अपनी पहचान बताये दिल के पास जुवान नहीं है लेकिन समर्पण को अड़ा है। मुझसे तेरा नाम बड़ा है। ताज लगाके सिहांसन बिठाऊं जो कही न कर दे अपना निरादर  दिल में जो है कह देता हूँ पर सच कहने से लागे डर। मेरा यश सम्मान राज खो न जाये कहीं आकर्षण जो पल पल मुझमें बढ़चढ़ा है।/मुझसे तेरा नाम बड़ा है। बड़े लोग शक्ति संपन्न नौकर चाकर की कहां कमी सब कुछ पहले से उपलब्ध उनकी चाहत में विलासिता रमी। एक बात मन में ख़लती  उनके पास राजाओं की कमी चमचमाते दुनिया में स्वयं होकर एक स्थिर फीका दूर खड़ा है।/ मुझसे तेरा नाम बड़ा है।   मेवालाल

मेरी मां को धूप लगती है (कविता ) ~ मेवालाल

  घर से निकलते हुए चोट में काम करते हुए अब मेरी माँ को धूप लगती है आखों से बराबर देख नहीं पाती कान जलने लगते है त्वचा फटने लगती है। अब बोझा सिर को बर्दाश्त नहीं पैर लड़खड़ाने लगते हड्‌डी टूटने लगती अन्दर ही अन्दर खुद को संभालने में असमर्थ फिर भी  परिवार के बारे में सोचती रहती व्यवस्था कही टूट न जाये विरासत अपना जो छूट रहा है मुझसे आखिर जायेगा कहाँ कहीं अधिक बोझा न हो बेटे के सिर पर फिर भी  जिम्मेदारी संभालते हुए चिंता करती रहती माथे पर हाथ रखकर उम्र ने छीन ली उनकी सहनशीलता कमजोर पाकर सूरज कर रहा अत्याचार मेरे जीवन के सूरज को जला रहा सूरज मेरा कितना धूप सा संघर्ष समय ने कितना बदल दिया  बर्दाश्त नहीं हो रहा परिवर्तन जानता हूं ताकत अपना समय अति बलवान कोई लड़ने को कैसे सोचे। समय के एकरेखीय चाल से  बगल खड़ा करूं मां  उसे मिलेगी चुनौती मुझसे अनुशासन शरीर में है  प्राथमिकता मस्तिष्क में समय बलवान है तो क्या पूर्वक्रिया दूर दृष्टि अपनी भी है ताकतवर कलम की स्याही स्याही से उत्पादन मिली चुनौती  समय को मुझसे              ...

एडेनियम ओबेसम (कविता) ~ मेवालाल

मोटा तन पतली पतिया गाढ़ा रंग एडेनियम ओबेसम आकर्षण से जिज्ञासा जागी पूछने पर बतायेगा नहीं अपना परिचय अजनबी को मैं कहानी गढ़ लूँगा इसको देखकर  रेगिस्तान के गुलाब को गमले की छोटी दुनिया में इतना बड़ा रंगगत लेकर ये कैसे झुका हुआ है? सम्पर्क से बस एक स्पर्श से मैं इसका बड़ापन देखू लाल पुष्प हरी पत्तिया वहीं छोटे कद में है प्रसिद्ध कुरुप दुनिया का यह कैसे कर रहा प्रतिनिधि? यथावत मैं समझ न पाउँगा होगा अपने भावो का आरोपण वैसे शब्दों की कमी बहुत है मैं इसकी मखमली कोमलता देखू ।                                              मेवालाल

जाति का उन्मूलन – अम्बेडकर से परे (शोध पत्र) ~ मेवालाल

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 जाति का उन्मूलन - अंबेडकर से परे मेवालाल    शोध सारांश   समकालीन संवैधानिक काल में संविधान जिसमें जाति के आधार पर भेदभाव और अस्पृश्यता का अंत कर दिया गया है। फिर भी दलितों का शोषण जाति और अस्पृश्यता के आधार पर हो रहा है। 1991 का आर्थिक उदारीकरण भी दलितों के लिए शून्य सिद्ध हुआ। दलित दलित ही रहा। यह जाति ही है जो शोषको को अभिप्रेरित (motivation) करती है। दूसरी ओर दलितों को अनाभिप्रेरित (demotivation) करती है जिसके कारण आज भी दलितों में अकर्मणता तथा दास चित्तवृत्ति विद्यमान है। “जहां सार्वजनिक भावना, सार्वजनिक दानशीलता, सार्वजनिक जनमत, जिम्मेदारी, वफादारी, सदगुण, नैतिकता, सहानुभूति सब जाति तक सीमित है।’’1 जहां मानवतावाद और आपसी प्रेम जाति तक सीमित हो। जहां द्विज और दलित पहले से ही एक दूसरे के प्रति पूर्वाग्रह पाले हुए हो और दूर दूर रह रहे हो, जहां एक समुदाय विशेष के लोग सामाजिक सामंजस्य छोड़कर विभाजन का उपदेश दे रहे हो, समाज में जहां रोटी बेटी का संबंध मौजूद है वहां भी, जहां नहीं मौजूद है उस समाज में भी जाति के आधार पर शोषण हो रहा है। निसंदेह जात...

योगी बाबा की व्याहारिक राजनीति (लेख) ~ मेवालाल

  उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के पंचुर गांव में जन्मे योगी आदित्यनाथ (5 जून 1972 से वर्तमान) ने गणित से स्नातक उत्तीर्ण की। लेकिन उनके जीवन को 1990 के दशक के राम मंदिर आंदोलन ने एक दिशा दी। 1993 में गुरु महंत अवैद्यनाथ (तत्कालीन महंत और सांसद) से गोरखपुर मठ में दीक्षा ली। 1994 में संन्यास लेकर अजय सिंह विष्ट से योगी आदित्यनाथ बनते है और आध्यात्मिक जीवन में पूरी तरह रम जाते हैं ‘उनका राजनीति में प्रवेश 1998 में एक स्थानीय झगड़े से प्रेरित था। गोरखपुर के इस विवाद में उन्होंने छात्रों का नेतृत्व किया और प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाई। इस घटना ने उन्हें जननायक के रूप में स्थापित कर दिया।(बीबीसी 5 जून 2019) इसके बाद गुरु अवैद्यनाथ ने राजनीति में आगे बढ़ने को प्रोत्साहित किया और 1998 के चुनाव में गोरखपुर से सांसद चुने गए। 1998 से 2017 तक पांच बार गोरखपुर से सांसद रहे। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा के जीत के बाद उन्हें मुख्यमंत्री चुना गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के पूर्व इस राज्य में आये दिन दंगा होता रहता था। त्योहारों पर स्थिति अत...