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Showing posts from January, 2026

नचना (कहानी) ~ मेवालाल

  ‎लोगों के पास खेती करने के लिए जमीन नहीं थी। गाँव के सभी लोग हरवाही करते थे। पिता और पिता के पुत्र दोनों हरवाही करते थे। हल बैल किसानों के होते थे और जमीन मालिक की होती थी। खेत को जोतते बोते थे। फसल की रखवाली, कटाई और मड़ाई करते थे। किसान मात्र हल नहीं चलाता था बल्कि उनके द्वार पर दिन रात लगे रहते थे। घर परिवार की उपेक्षा भी करनी पड़ती थी। फसल तैयार होने पर मिला पारिश्रमिक से परिवार के सभी लोगों का पेट नहीं भरता था। जो मिलता था वह अगली फसल तैयार होने तक नहीं चलता था। मालिक मात्र बड़े संपदा के मालिक न थे बल्कि लोगों के दिमागों के मालिक थे। कोई भी काम काज होता था तो लोग उन्हीं से सलाह लेने आते थे। उन्हीं के दया पर सम्पन्न होता था। लोगों शादी आदि पर अनाज को खर्च करने के लिए अपना पेट काट काट कर अनाज बचाते थे। फिर भी कम ही पड़ जाता था। लोगों के तन पर एक कपड़ा बड़ी मुश्किल से नसीब होता था। पाँच साल तक लड़के नंगे ही रहते थे। सम्मान की बात लोगों में न थी। बात थी तो किसी तरह जिंदगी काटने की। भीखू ऐसे सब लोगों में से एक था। जीवन की एक तिहाई उमर बीत गई थी। मालिक की सेवा करते हुए अपने माता-पिता...

सत्तू (कहानी) ~ मेवालाल

‎जब दिशाएं नहीं जगती थी तब मुरली बिस्तर से उठकर नित्य क्रिया कर्म करके अपने भैंस के गोबर पानी में जुट जाता था। ताकि सुबह होने तक घर का काम समाप्त हो जाए और खेत पात का काम शुरू हो जाय। पत्नी चंदा थोड़ा देर से उठती थी । लेकिन वह भी दिन और रात के आलिंगन में ही अपना चूल्हा चौका समाप्त करके वर्तन मांजती थी। ताकि सुबह होने तक पति के साथ खेत के काम में हाथ बटा सके। दोनों लोगों द्वारा घर का काम समाप्त होते होते तारे अपनी चमक खो देते थे। पक्षियों का कलरव आसपास पेड़ो पर शुरू हो गया था। जिसमें सभी चिड़ियों का अपना अपना ढपली अपना अपना राग था। कोई एक चिड़िया एक राग छेड़ती तो दूसरी चिड़िया उसका अनुसरण न करती बल्कि अपना राग जपने लगती। इसलिए कुछ साथी पेड़ छोड़कर उड़ जाती। कि मुझसे गाना नहीं हो पाएगा और अनुसरण भी नहीं हो पाएगा। फिर भी कुछ शेष चिड़िया थी जो भावहीन और लयहीन गाना गुनगुना रही थी। वे जान रही थी कि इंसान हमारे इस गीत में रुचि लेते है। लेकिन इंसानों को सब मिलाकर खिचड़ी राग सुनाई दे रहा था। इधर उधर दौड़ लगाती अन्य चिड़िया पेड़ पर बैठती और कुछ विचार विमर्श कर उड़ जाती। मानो सभा करके आपस में बात कर रही हो क...

साइकिल (कहानी) ~ मेवालाल

  ‎वह पसंद के हर स्तर को समझना चाहता था। उसने बहुत सोचा कि वह पसंद के पीछे का पर्दा उठा दे और लोगों को बता दे कि लोगों की पसंद उनकी आंतरिक शक्ति का बाह्य रूप है। लेकिन यह समझने वाला कौन था? गर समझ भी जाय तो क्या उसकी स्थिति बदल जाएगी। नहीं न। यही सोचते हुए उज्ज्वल बस की पायदान पर खड़े होकर यात्रा कर रहा था। भीड़ से पैरों को बार बार समायोजित कर रहा था। वह अपने आप में जल रहा था और वह हीनताबोध से भरा जा रहा था। यात्रा लंबी न थी बस हेल्थ सेंटर से बिरला ब छात्रावास तक। उसने तय कर लिया था कि वह बस के पायदान पर खड़े होकर यात्रा नहीं करेगा। चाहे पैदल ही क्यों न चलना पड़े। या अत्यधिक समय क्यों न लगे। उसे इतना बुरा क्यों लग रहा था वह स्वयं नहीं समझ पा रहा था कि मस्तिष्क के दुनिया में क्या हो रहा है। सवाल उसके अंदर था कि उसका मन उसको सांत्वना क्यों नहीं दे रहा है। इतने में बिरला ‘स’ पर बस रुकी और उज्ज्वल वही उतर गया और पैदल बिरला ‘ब’ की तरफ बढ़कर चल दिया। फिर भी उसे सुख का अनुभव न हुआ। उसे सुरक्षा की चिंता न थी। अब उसे अपने बारे में जानने की जिज्ञासा प्रकट हुई। वह तार्किक था। वह इसे भावना से जो...

मानवता (प्रेम कहानी) ~ मेवालाल

रात को आग और ध्रुव को साक्षी मानकर और सात फेरे लेकर शादी हो चुकी थी। आज बारात विदाई के साथ दुल्हन की भी विदाई होने वाली है। सुबह का सूरज चढ़ आया है। रात के सजावट के समान को लोग उतार रहे है। द्वार पर बिखरे पड़े पत्तल और दोने चम्मच को एक दो लोग साफ कर रहे है। जो द्वार पर आ रहा है मिठाई खाकर पानी पी रहा है। बारातियों के नाश्ते के लिए चाय और कॉफी का डग बड़े चूल्हे पर पक रहा है। मूंगदाल का हलवा तैयार हो चुका है। कचौड़ी और  सब्जी तैयार होना बाकी था। कन्या पक्ष की ओर लगभग आठ दस रिश्तेदार थे। बारात करीब तीन सौ मीटर दूर एक खेत में टिकी थी। बारात के कुछ लोग रात को ही भोजन करके निकल गए थे। बारात में अब दुल्हा के मामा फूफा, चाचा और एक दो बुजुर्ग और चार-छह लड़के बचे थे। बारात के एक दो लोग दीनानाथ के द्वार पर आकर विदाई की इजाजत माँग रहे थे। लेकिन दीनानाथ बिना नाश्ता करके जाने का इजाजत नहीं दे रहे थे। दीनानाथ का चेहरा थकान से बहुत मलिन था। पर्याप्त नींद के अभाव में पलके भारी और आँखे लाल थीं लगातार दौड़ धूप के कारण उनका पैर मंद गति से आगे पड़ रहा था। अस्त व्यस्त कपड़े उनके परिश्रम के गवाही दे रहे ...

मन की चोट (कहानी) ~ मेवालाल

‎काजू का नाम काजू इसलिए पड़ा कि जब वह करवट लेकर सोती थी पैर को घुटनों से सिकोड़ते हुए उसमें हाथ की कोहनी मिलाकर और थोड़ा सर को झुका लेती थी। तब बिल्कुल काजू का आकार की हो जाती थी। यह उसका नकली नाम था लेकिन घर वाले दुलार से काजू ही कहते थे। दूसरी उसकी आकर्षक विशेषता यह थी कि वह बिना होठ दबाए मुँह खोलकर बाएं तरफ होठों को खींचकर हँसती थी तो लगता था कि चाँद-तारे टूट रहे हो। ऐसा कोई हो ही नहीं सकता जो उसके हँसी को देखकर प्रसन्न न हो। उसके अंदर निडरता थी। वह आँख से आँख मिलकर बात करती थी वह यह नहीं समझती थी कि अभी मेरे पास शब्दों की कमी है। समय के साथ वह बड़ी हुई। समय से कदम मिलते हुए उसने चलना सिखा कि इसी बीच कुछ याद आया। ‎चार साल की काजू अपने छोटे भाई पप्पू के साथ घर के बरामदे में ‘बाघ-बाघ’ खेल रही थी। इस खेल में उसका अपना निजी अनुभव था। वह अपने अनुसार ही खेल खेलती थी। इस खेल में उसके पास कोई नियम या कायदा नहीं था। इसमें उसकी अपनी वेशभूषा, धरती मंच और हाथ का डंडा हथियार था। डंडे को जादू की छड़ी के रूप में देखा जाय तो वह एक राजकुमारी लग रही थी। यही पप्पू से संवाद का माध्यम था। दो पैरों से धी...